6. पोषण (Nutrition)

पोषण (Nutrition)

सभी जीवधारियों को अपने शरीर के निर्माण के लिए तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा उन्हें भोजन से प्राप्त होती है जिसमें पोषक तत्व होते हैं। जीवों द्वारा भोजन को प्राप्त करने की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं। पोषण की मुख्यतः तीन प्रकार हैं।

A. स्वपोषण(Autotrophic):

अनेक जीवधारी अत्यन्त सरल पदार्थों से अपनी भोजन सामग्री का निर्माण स्वयं करते हैं। इस प्रक्रिया को स्वपोषण तथा ऐसे जीवधारियों को स्वपोषी कहते हैं। स्वपोषी जीवधारी ही प्रकृति में भोजन का उत्पादन करते हैं और उत्पादक कहलाते हैं।

सभी हरे पौधे प्रकाश की उपस्थिति में जल व कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके पत्तियों में उपस्थित पर्णहरित की सहायता से कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण करते हैं। इस प्रक्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। कुछ जीवाणु, जिन्हें हरित सल्फर जीवाणु कहते हैं। जल के बजाय हाइड्रोजन सल्फाइड से हाइड्रोजन प्राप्त करते हैं।

B. परपोषण (Heterotrophic Mode of Nutrition) :

अनेक जीवधारी प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपने भोजन का निर्माण करने में असमर्थ होते हैं। अतः ये भोज्य पदार्थों के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भर होते हैं। ये परपोषी कहलाते हैं।

सभी जन्तु व कुछ पौधे भी परपोषी होते हैं। ये भी दो प्रकार के होते हैं-

  1. मृतोपजीवी(Saprophytes) मृत तथा क्षय शरीर से भोजन प्राप्त करने वाले जीवधारियों को मृतोपजीवी कहते हैं। ये अपना भोजन सड़ेगले पत्तों, पौधों पर क्षय होते कार्बनिक पदार्थों से ग्रहण करते हैं। सड़ी-गली पत्तियों के ढेर पर उगता कुकुरमुत्ता, डबलरोटी या आचार पर उगती फफूंदी, दही में उपस्थित जीवाणु, आदि सभी मृतोपजीवी हैं।
  2. परजीवी(Parasites) वे जीवधारी जो अपना पोषण दूसरे जीवधारी से प्राप्त करते हैं अपने भोजन के लिए दूसरे जीवधारी पर आश्रित रहते हैं उन्हें परजीवी कहते हैं। जो जीवधारी पोषण प्रदान करते हैं उसे पोषी कहते हैं।

परजीवी जन्तुओं के प्रकार

  1. वाह्य परजीवीः बाह्य परजीवी पोषक के शरीर के बाहर ऊपरी सतह पर रहते हैं जैसे, जूं, खटमल आदि।
  2. अन्तः परजीवीः ये पोषक के शरीर के अन्दर विद्यमान रहते हैं। यदि ये कोशिका के भीतर रहते हैं तो इन्हें अन्तः कोशिकीय परजीवी और यदि कोशिका के बाहर ऊतक में रहते हैं तो इन्हें अन्तराकोशिकीय परजीवी कहते हैं। उदाहरण : प्लाजमोडियम तथा एण्टअमीबा अन्त परजीवी हैं।

C. परपोषी पोषण(Holozoic):

जो जीव तैयार भोजन को खाते हैं- जैसे- मनुष्य, गाय

विषमपोषी पौधों के प्रकार (Types of Hetrotropic Plant)

कुछ पौधे पर्णहरित होते हुए भी प्रकाश-संश्लेषण द्वार अपने भोजन का निर्माण करने में असमर्थ होते हैं। अतः वे भोज्य पदार्थों के लिए अन्य पौधों पर निर्भर रहते हैं। पोषण विधि के आधार पर निम्नलिखित वर्ग हैं।

  1. परजीवी पौधे (Parasitic plants): ये पौधे अपना भोजन दूसरे पौधों की कोशिकाओं से विशिष्ट अंगों चूषकांग द्वारा भोजन प्राप्त करते हैं। भोजन प्रदान करने वाले पौधों को पोषक कहते हैं तथा भोजन ग्रहण करने वाले पौधों को परजीवी कहते हैं। परजीवी पौधे पोषक पौधों की कोशिकाओं से चूषकांगों द्वारा जल, खनिज तत्व तथा कार्बनिक यौगिकों का अवशोषण करते हैं।
  2. सहजीवी पौधे(Symbiotic Plants) : जब दो पौधे इस प्रकार से संबंधित रहते हैं कि दोनों एक दूसरे के लिए लाभकारी हों तो इस प्रकार के संबंध को सहजीविता कहते हैं तथा इन पौधों को सहजीवी पौधे कहते हैं। उदाहरण : लाइकेन, फली वाले पौधों की जड़ों की गांठों में बेसिलस रेडिसिकोसा या राजजोबियम लेग्युमिनोसेरम नामक जीवाणु।
  3. मृतोपजीवी पौधे((Sapraphytic Plants) : इस वर्ग के पौधे मृतजीवों का विघटन करके उनसे कार्बनिक यौगिकों का अवशोषण करते हैं। उदाहरणः पोलिपोरस, कुकुरमुत्ता आदि, सड़े-गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं।

पोषक पदार्थ (Nutrition Substances) रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थ निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

कार्बोहाइड्रेट(Carbohydrate) :

ये कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के यौगिक हैं। इसके अणु में हाइड्रोजन के परमाणुओं की संख्या ऑक्सीजन के परमाणुओं की संख्या से दुगुनी होती है। कार्बोहाइड्रेट बहुत सरलता से मिलने वाले भोज्य पदार्थ हैं। इनका आधारभूत सूत्रा(CH2O)n होता है। यह निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

मोनोसैकराइड्स(Monosaccharides) :

ये सभी कार्बोहाइड्रेट्स में सबसे अधिक सरल होते हैं। इनका आधारभूत सूत्रा (CH2O)n होता है। इसके निम्नलिखित उदाहरण हैं- जैसे ग्लूकोस, फुक्टोस एवं गैलेक्टोस।

डाइसैकराइड्स(Disaccharides) :

यह मोनोसैकराइडस के दो अणुओं से मिलकर बनता है। इसका आधारभूत फार्मूला C12H22O11 है। कुछ डाइसैकराड्स के उदाहरण निम्नलिखित हैं-

  1. सुक्रोस (Sucrose): यह गन्ने, चुकंदर, गाजर तथा मीठे फलों में पाया जाता है।
  2. माल्टोस(Maltose) : यह स्वतन्त्रा रूप से नहीं पाया जाता है। यह बीजों की शर्करा अर्थात माल्ट शुगर होती है।
  3. लैक्टोस (Lactose): यह शुद्ध दूध में पाई जाती है तथा ग्लूकोस एवं गैलेक्टोस अणुओं के संयुक्त होने से बनती है। यह कम मीठी होती है तथा पौधों में पाई जाती है।

पालीसैकराइड्रस (Polysaccharides):

ये अनेक मोनोसैकराइड अणुओं के मिलने से बनते हैं। इसका आधारभूत सूत्रा (C6H11O5)n है। ये जल में अघुलनशील होते हैं। पौधों में मुख्य रूप से पाए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर जल-अपघटन द्वारा ग्लूकोस में विघटन होता है। इस प्रकार के ऊर्जा उत्पादन के लिए संग्रहीत ईंधन का कार्य करते हैं

  1. मॉड या स्टार्च(Starch) यह सभी प्रकार के अनाजों, बहुत सी सब्जियों विशेषकर आलू, शकरकन्द इत्यादि में मिलता है।
  2. ग्लाइकोजन(Glycogen) यह जन्तु के शरीर में संचित अवस्था में रहता है तथा आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग होता है।
  3. सेलुलोस(Cellulose): वनस्पति कोशिकाओं की कोशिका भित्ति इसी से बनी होती है इसलिए वनस्पतियों में मिलता है। यह जल में अघुलनशील होता है।
  4. काइटिनः यह कुछ आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के बाह्य कंकाल का निर्माण करता है। यह जल में अघुलनशील होता है।

वसा(Fats) :

ये कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से मिलकर बने होते हैं। परन्तु इनमें कार्बोहाइड्रेटस की तुलना में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम होती है। जल में यह पूर्णतया अघुलनशील है, परन्तु क्लोरोफॉर्म, बेन्जीन, पेट्रोलियम, आदि कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होती है। वसा के एक अणु का संश्लेषण ग्लिसरौल तथा वसीय अम्लों के तीनों अणुओं के एस्टर बन्ध द्वारा आपस में जुड़ने से होता है। इसी कारण इनको ट्राइग्लिसराइड्रस भी कहते हैं। क्षार द्वारा इनका पायसीकरण (emulsification) हो सकता है। रसायनिक दृष्टि से वसाएं मुख्यतया दो प्रकार की होती हैं-

  1. वास्तविक वसा (True Fats) : यह प्रकृति में वनस्पतियों, फलों बीजों आदि में प्रर्याप्त मात्रा में मिलती है। जन्तुओं में यह वसा ऊत्तक के अतिरिक्त यकृत तथा अस्थि मज्जा में भी संचित रहती है। इन वसाओं के जल-अपघटन के फलस्वरूप वसा अम्ल तथा एल्कोहल प्राप्त होता है। उदाहरण : ट्राइओलिन(Triolin) ट्राइपालमिटिन(Tripalmintin) आदि।
  2. संयुक्त वसा (Compound Fats ) : जीवद्रव्य की इन वसाओं में नाइट्रोजन तथा फास्पफोरस के अंश होते हैं अतः इन्हें जटिल लिपिड्रस भी कहते हैं। यह मुख्यतया दो प्रकार की होती हैं-
  3. फास्पफोलिपिडः इनमें फास्पफोरस भी पाया जाता है। सामान्यतया यह अण्डे की जर्दी, पित्त, यकृत एवं पेशियों में संचित रहती है।
  4. ग्लाइकोलिपिडः यह तन्त्रिका तन्त्रा के ऊतकों में पाई जाती है।

वसाओं एवं तेल के अतिरिक्त लिपिड के कार्य

  1. मोम(Waxes) पौधों द्वारा इनका उपयोग जल के प्रति दृढ़ता बनाए रखना है। उदाहरण- पौधों की पत्तियों, फलों तथा बीजों पर यह आवरण बनाकर जल से रक्षा करता है।
  2. फॉस्फोलिपिड (Phospholipid) : जैव कलाओं का निर्माण करता है।
  3. स्टीराइड्रस(Steroids) : पित्त(Bile), अम्ल(Acid), लैंगिक हार्मोन(Sex hormones), जैसे ऑयस्ट्रोपजन(Estrogen), प्रोजिस्टीरोन(Progesterone) आदि, कोलेस्टेरॉल(Cholesterol), विटामिन D, एड्रीनोकॉर्तिक हार्मोन(adrenotropic hormone), एल्डोस्टीरोन(Aldosterone), कार्टिकोस्टीरोन(Corticosterone), कॉर्टीसोन(Cortisone) आदि का निर्माण करता है।
  4. लिपोप्रोटीन(Lipoprotein) : जैव कलाओं का निर्माण इन्हीं से होता है।
  5. ग्लाइकोलिपिड(Glycolipid) : यह तन्त्रिका कोशिका, कला तथा क्लोरोप्लास्ट की कलाओं का निर्माण करता है।

प्रोटीन (Proteins)

प्रोटीन अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन एवं फास्पफोरस के यौगिक हैं। पूर्ण विखण्डन पर इनके अणु सरल अमीनो अम्लों के अणुओं के रूप में टूटते हैं। जीव द्रव्य में लगभग 20 प्रकार के अमीनो अम्ल होते हैं।

सभी अमीनो अम्लों की रचना में एक ही समानता होती है। प्रत्येक में एक क्षारीय अमीनो समूह (NH2) तथा एक अम्लीय कार्बोक्सिल समूह (—COOH) होता है। प्रोटीन जल में प्रायः अघुलनशील होते हैं परन्तु क्षारीय या अम्लीय घोलों में घुलनशील होते हैं। घुलनशील प्रोटीन एक कोलॉइडी घोल बनाते हैं जो झिल्ली से निस्पंदित नहीं हो सकता।

प्रोटीन शरीर के लिए बहुत आवश्यक अवयव है, क्योंकि यह शरीर की वृद्धि तथा ऊतकों की टूट-फूट के लिए बहुत आवश्यक होते हैं। संगठन के आधार पर प्रोटीन तीन प्रकार के होते हैं- a. सरल प्रोटीन(Simple protein), b. संयुक्त प्रोटीन(Conjugated protein) और c. व्युत्पन्न प्रोटीन(Derived protein)

प्रोटीन के स्रोतः दूध, सभी प्रकार की दालें, सोयाबीन, अण्डा, मांस, मछली, सूखे फल आदि।

खनिज(Minerals)

जो पदार्थ प्राकृतिक रूप से मृदा में मिलते हैं खनिज पदार्थ कहलाते हैं। ये भोजन के लिए बहुत आवश्यक अवयव है किन्तु शरीर में बहुत कम मात्रा में होते हैं। ये भोजन के अर्काबनिक अवयव हैं। जैसे : कैल्शियम, पोटैशियम, लोहा, फास्पफोरस, मैग्नीशियम आयोडीन, सल्फर तथा इनके बहुत से लवण।

खनिजों के स्रोतः खनिजों के मुख्य स्रोत हैं – दूध, खाने का नमक, हरीसब्जी, अनाज, मांस, सलाद, किशमिश, आलू बुखारा, समुद्र से प्राप्त होने वाली वस्तुएं, आयोडीन युक्त नमक आदि।

विटामिन(Vitamins)

विटामिन भी भोजन के बहुत महत्वपूर्ण तत्व हैं। यद्यपि शरीर को इनकी बहुत सूक्ष्म मात्रा में आवश्यकता होती है। फिर भी शरीर पर इनका बहुत प्रभाव पड़ता है। विटामिन जैव पदार्थ है तथा प्राणियों में या उनकी वृद्धि एवं विकास के लिए बहुत आवश्यक है। इनका ऊर्जा स्रोत के रूप में कोई महत्व नहीं है, किन्तु शरीर के विभिन्न उपापचयी प्रक्रमों पर नियंत्राण करते हैं और शरीर की बीमारियों से रक्षा करते हैं। विटामिनों की कमी से भी रोग उत्पन्न हो जाते हैं जिन्हें अपूर्णता रोग कहते हैं।

संतुलित भोजन(Balanced diet) : हमारा भोजन इस प्रकार का होना चाहिए कि जिसमें हमें भोजन के सभी तत्व मिलें। इस प्रकार के भोजन को जिसमें मनुष्य की आयु, लिंग तथा उसके कार्य के अनुसार भोजन मिले जिससे उसके शरीर की सारी आवश्यकताएं पूरी हों,

सन्तुलित भोजन(Balanced Diet) कहते हैं। एक सामान्य मनुष्य को जो दिन में 4 से 6 घंटे परिश्रम करता है प्रतिदिन 100 ग्राम प्रोटीन, 60 ग्राम वसा, 450 ग्राम कार्बोहाइड्रेटस तथा 30 ग्राम खनिज लवणों से युक्त भोजन की आवश्यकता होती है। 6 से 8 घंटे कार्य करने वाला औसत आयु के मनुष्य में 160 ग्राम प्रोटीन, 68 ग्राम वसा 1550 ग्राम काबोहाइड्रेटस तथा 50 ग्राम खनिज लवण से युक्त भोजन की आवश्यकता होती है।

महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ तथा उनके कार्य
खनिज पदार्थ सामान्य महत्व अभाव के कारण सामान्य भोजन स्रोत
नाइट्रोजन(N) प्रोटीन संश्लेषण तथा न्यूक्लिक अम्ल का एन्जाइम, आदि का संश्लेषण क्वाशिओरकर को रोग प्रोटीन के अभाव से दालें, मांस, मछली दूध
फास्फोरस(P) न्यूक्लिक अम्ल तथा कुछ प्रोटीनों का संश्लेषण, दांत अस्थि कलाओं आदि का निर्माण कमजोर अस्थि वृद्धि दूध
पोटैशियम(K) कलाओं आदि का निर्माण बहुत कम अभाव होता है सब्जियां तथा मांस, प्रोटीन, सेम, मछली तथा दूध, नमक
सल्फर(S) प्रोटीन संश्लेषण को एन्जाइम A मांसपेशियों का फटना नमक, सब्जियां आदि
सोडियम(Na) कलाओं के कार्य से संबंधित नमक
क्लोरीन(CL) S तथा NA के समान तथा

जहर रस में HCL के रूप में

मांसपेशियों का फटना नमक, सब्जियां आदि
मैग्नीशियम(Mg) अस्थि तथा दांत अनेक –

एन्जाइमों के लिए को-फेक्टर

Atpuse को क्रियाशील करता है।

सब्जियां तथा अन्य खाद्य पदार्थ
कैल्शियम(Ca) निर्माण, शैल तथा इनेमल का निर्माण के लिए

ATPose को क्रियाशील करता है।

रुधिर जमने में महत्वपूण

अस्थि वृद्धि दूध तथा पानी

पाचक एन्जाइम

जैव उत्प्रेरक(Catalyst) होते हैं तथा मुख्यतया इनके द्वारा पाचन सहित सभी जैव-रासायनिक अभिक्रियाएं उत्प्रेरित होती हैं। एन्जाइम के द्वारा ही खाद्य पदार्थों के बड़े-बड़े अघुलनशील अणु छोटे-छोटे अणुओं में परिवर्तित होते हैं। एन्जाइम के अभाव में पाचन असम्भव होता है। एन्जाइम का नामाकरण सब्स्ट्रेट अथवा जिस पदार्थ पर एन्जाइम क्रिया करता है, उस पदार्थ के नाम के अन्त में एज(ase) शब्द जोड़कर किया जाता है। उदाहरणार्थ- माल्टौस शर्करा से क्रिया करने वाले एन्जाइम को माल्टेज़(Maltase) तथा लैक्टोस(Lactose) शर्करा से क्रिया करने वाले एन्जाइम को लैक्टेज एन्जाइम का नामकरण किया गया है। एन्जाइम स्वयं परिवर्तित हुए बिना ही रासायनिक प्रतिक्रियाओं(Chemical reactions) को उत्प्रेरित करते हैं। किसी

एन्जाइम की सूक्ष्म मात्रा किसी विशेष रासायनिक प्रतिक्रिया को उत्प्रेरित करने के लिए प्रर्याप्त होती है। एन्जाइम को पाचन में रासायनिक कारक कहा जाता है। रासायनिक जल-अपघटन होता है।

एन्जाइमों की विशेषताएं

  1. ये कोलॉइडी स्वभाव के होते हैं तथा जल में कोलॉइडी घोल बनाते हैं।
  2. इनकी उपस्थिति के कारण रासायनिक क्रियाएं तीव्र हो जाती हैं।
  3. रासायनिक क्रियाओं में एन्जाइम स्वयं प्रयोग में नहीं आते हैं।
  4. एक प्रकार का एन्जाइम केवल एक ही प्रकार के पदार्थ पर प्रकाश डालता है।
  5. सामान्यतया यह जीवों में 250-450 ताप तक अधिक क्रियाशील होते हैं तथा 600 ताप पर नष्ट हो जाते हैं।
  6. सामान्यतया एन्जाइम निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। इनको क्रियाशील बनाने वाले पदार्थों को सक्रियक(Activator) कहते हैं। उदाहरण- जठर-ग्रन्थियाँ (Gastric glands) निष्क्रिय पैरिसनोजेन का स्रावण करती है जो कि अम्ल द्वारा क्रियाशील कर दिया जाता है।

सेलुलोज का पाचनः सेलुलोज को पचाने वाले एन्जाइम का नाम सेलुलोज(Cellulase) है। यह प्रायः बैक्टीरिया, प्रोटोजोन्स(Protozoans) तथा अकशेरुकियों लैपिस्मा, फेरिटिमा, टैरिडों में पाया जाता है। कशेरुकीय जन्तुओं में यह उत्पन्न नहीं होता है। शाकाहारी कशेरुकियों में सेलुलोस पाचन करने वाले सूक्ष्म जीव आहार नाल में विभिन्न भाग में सहजीवी के रूप में रहते हैं।

पोषक तत्वों की कमी तथा अधिकता के परिणाम

  1. प्रोटीन की कमी (Deficiency of Proteins) : प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप वृद्धि तथा ऊतकों की मरम्मत में अवरोध उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण हाथ-पैर दुबले-पतले हो जाते हैं। पसलियां अधिक विकसित दिखाई पड़ती है। त्वचा सूखी, झुरियोंदार, पतली हो जाती हैं, तथा दस्त लग जाते हैं। इस बीमारी को मारस्मस(Marasmus) रोग कहते हैं। इसके अतिरिक्त क्वाशिओरकोर(Kwashiorkor) नामक रोग भी हो जाता है जिससे पेट बढ़ जाता है, मांसपेशियां निर्बल हो जाती हैं। पाचन क्रिया में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इसके फलस्वरूप पेचिश भी हो जाती है।
  2. लोहे की कमी (Iron Deficiency) : लोहे की कमी से एनीमिया(Anemia) नामक रोग हो जाता है। इसके फलस्वरूप रुधिर में लाल रुधिराणुओं की मात्रा तथा माप और हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है।
  3. फोलिक अम्ल तथा विटामिन बी कॉम्प्लेक्स की कमी (Deficiency of Folic acid and Vitamin B Complex) : फोलिक अम्ल तथा विटामिन बी की कमी से मेगालोप्लास्टिक अनीमिया हो जाता है। इसके फलस्वरूप रुधिर में परिपक्व किन्तु बड़े लाल रुधिराणु पाए जाते हैं।
  4. विटामिन B12 की कमी (Deficiency of Vitamin B12) : इसकी कमी से परनीशियस एनीमिया रोग(Pernicious anemia disease ) हो जाता है। इस स्थिति में लाल रुधिराणु अपरिपक्व, केन्द्रकीय तथा हीमोग्लोबिन रहित होते हैं। इस रोग से रोगी की मृत्यु भी हो जाती है। इसके उपचार के लिए विटामिन B12 के इन्जेक्शन लगाए जाते हैं।
  5. विटामिन A की कमी (Deficiency of Vitamin A) : विटामिन A की कमी से नेत्रा का कॉर्निया मोटा, अपारदर्शी तथा कैरिटिनयुक्त हो जाता है। बच्चों में अंधेपन का मुख्य कारण विटामिन ए की कमी ही है। इस रोग को जीरोफ्रथैल्मिया(Xerophthalmia) कहते हैं। इसके अतिरिक्त इसकी कमी से रेटिना पटल के रोड्स(Rods) में रौडोप्सिन की कमी हो जाती है इसलिए कम रोशनी में दिखाई नहीं पड़ता। इस रोग को रात्रि अन्धता/रतौंधी(Night Blindness) कहते हैं।
  6. विटामिन D की कमी (Deficiency of Vitamin D) : इसके फलस्वरूप अस्थियां कमजोर तथा मुलायम हो जाती हैं क्योंकि इनमें कैल्शियम तथा फास्पफोरस जमा नहीं होता। ह्यूमेरस तथा फीमर, लम्बी अस्थियां मुड़ जाती हैं। कलाई, घुटने, कोहनी आदि के जोड़ों पर सूजन आ जाती है। इस रोग को बच्चों में रिकेट्स(Rickets) रोग कहते हैं।

व्यस्कों की रीढ़ में हड्डी कमजोर हो जाती है। पेल्विस अस्थि(Pelvis bone) मुड़ जाती है और भार के कारण इसकी आकृति विकृत हो जाती है। व्यस्कों में इस रोग को आस्टियोमलेशिया(Osteomalacia) कहते हैं।

  1. विटामिन B1 की कमी Deficiency of Vitamin B1) : इससे उत्पन्न रोग को बेरी-बेरी(Beri-beri) कहते हैं। इसके फलस्वरूप वायवीय(Pneumatic) कार्बोहाइड्रेट उपापचय(metabolism) कम हो जाता है। परिधीय तन्त्रिकाएं(Peripheral nerves) सूज जाती है, दर्द होता है, पाद कमजोर हो जाते हैं। लकवा(Paralysis) के लक्षण विद्यमान हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऊतकों में द्रव एकत्रित हो जाता है। इसे हाथ-पैरों का एडिमा(Oedema) तथा हृदय में द्रव एकत्रित हो जाने पर हृदय ऐडिमा(Cardiae Oedema) कहते हैं।
  2. विटामिन C की कमी (Deficiency of Vitamin C) : इसकी कमी से स्कर्वी(Scurvy) रोग हो जाता है। इस रोग के फलस्वरूप रुधिर वाहिनियों में विकृत कॉलेजन(Collagen) तन्तु के होने से वे फट जाती हैं। मसूड़ों में से रुधिर बहने लगता है। दांत गिरने लगते हैं, अस्थियां कमजोर हो जाती हैं और सुगमता से टूट जाती हैं तथा घाव देर से भरता है।
  3. विटामिन K की कमी (Deficiency of Vitamin K) : इसकी कमी से रुधिर देर से जमता है। इसलिए रुधिर तेजी से निकलता रहता है।
  4. निकोटिनैमाइड की कमी (Deficiency of Nicotinamide) : इसकी कमी के फलस्वरूप होंठ सूज जाते हैं। हाथ-पैरों की त्वचा मोटी, रंगायुक्त हो जाती है और उत्तेजनशीलता बढ़ जाती है।

सुपोषण की अधिकता के परिणाम(Excess of Saturated Fats)

  • संतृप्त वसा की अधिकता (Excess of saturated fat) : मक्खन, घी, मांस, अण्डे आदि में यह प्रचुर मात्रा में होती है। इनके अधिक सेवन से रुधिर में कॉलेस्टीरॉल(Cholesterol) की मात्रा बढ़ जाती है जो रुधिर वाहिनियों की भित्तियों में जमा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप रुधिर वाहिनियों की गुहा तंग हो जाती है तथा वे सख्त हो जाती हैं। इसलिए रुधिर की गति धीमी हो जाती है और रुधिर दाब बढ़ जाता है। इससे हृदय से संबंधित रोग हो जाता है।
  • अधिक कैलोरी वाले भोजन की अधिकता (Excess intake of food Calories) : शहद, शक्कर, घी जैसे पदार्थों के अधिक सेवन से वसा ऊतकों में एकत्रित हो जाती है जिससे शरीर मोटा हो जाता है। रुधिर दाब(Blood pressure) बढ़ जाता है। डायबेटीज(diabetes) रोग तथा हृदय संबंधी रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इस रोग को स्थूलता(Obersity) कहते हैं |

पौधों में खनिज पोषण((Mineral Nutrition in Plants)

अकार्बनिक खनिज पदार्थ खनिज तत्वों से निर्मित होते हैं। पौधों द्वारा इन खनिज पदार्थों का अवशोषण खनिज पोषण कहलाता है। पौधों में पाए जाने वाले कुछ मुख्य खनिज तत्व, उनके प्रमुख कार्य व उनकी कमी के लक्षणः

खनिज तत्वकार्य कुछ सामान्य कमी को दर्शाने वाले लक्षण
1. कैल्शियम 1. कोशिका भित्ति के निर्माण में सहायक  तथा कोशिका भित्तियों के बीच मध्य पट्टिका में कैल्शियम पेक्टेट का निर्माण

2. एन्जाइम Atpase की क्रियाशीलता बढ़ाना

स्तम्भित या अवरुद्ध वृद्धि
2. फॉस्फोरस 1. न्यूक्लिक अम्लों, ATP तथा अनेक प्रोटीनों  का महत्वपूर्ण अवयव

2. कोशिका कला की संरचना हेतु फॉस्फोलिपिड का निर्माण

मुख्यतः जड़ों की स्तम्भित वृद्धि
सोडियम

पोटैशियम

1. मुख्यतः कोशिका कला से संबंधित कार्यों में

2. कोशिका के अन्दर तरलता की मात्रा को  नियंत्रित करना

पत्तियों के किनारे पीले, भूरे हो जाना तथा समय से पहले पौधे का मर जाना
क्लोरीन NA तथा K की भांति हरिमाहीनता
5. मैग्नीशियम 1. पर्णहरित Chloraphyll का एक आवश्यक भाग

2. कई एन्जाइम जैसे Atpase की उत्प्रेरक शक्ति के लिए आवश्यक

हरिमाहीनता
6. लौहा इलेक्ट्रॉन संवहकों, साइटोक्रोम का प्रमुख हरिमाहीनता
7. सल्फर क्लोरोफिल का निर्माण करने वाले पोरपफाइरिन का मुख्य
8. मैगनीज अवयव कई अमीनो अम्लों, विटामिन तथा को-एन्जाइम A का अंतिम अवयव प्रकाश-संश्लेषण तथा श्वसन में क्रियाशील डिकार्बोक्सिलेज तथा डिहाइड्रोजीनेन एन्जाइमों एवं फॉस्पफोटेजों का मुख्य अवयव नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक पत्तियों पर पीले धब्बे पड़ना वृद्धि की दर में कमी
9. तांबा 1. श्वसन में साइटोक्रोम आस्किडेज की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक

2. प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक प्लास्टोसायनिन का प्रमुख अवयव एल्कोहॉल

स्तम्भों का डाई बैक
10. जिंक डीहाइड्रोजीनेन, आदि एन्जाइम का सक्रिय कारक स्तम्भित वृद्धि, पत्तियां विकृत हो जाती है, अंतरशिरीय हरिमाहीनता
11. बोरॉन पौधों में शर्करा का स्थानान्तरण, विभज्योतकों में कोशिका विभाजन पुष्पन की कमी, कोशिका विभाजन में कमी, जड़ों के विकास में कमी, लेग्यूमिनस पौधों की गुटिकाओं में कमी।
12. नाइट्रोजन प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल  (DNA & RNA) तथा अन्य कार्बनिक पदार्थों का निर्माण उदाहरण-कोएन्जाइम तथा क्लोरोफिल स्तम्भित वृद्धि तथा हरिमाहीनता

पौधों में नाइट्रोजन (Nitrogen Nutrition in Plants)

पौधों के न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन तथा अन्य नाइट्रोजन युक्त पदार्थों के संश्लेषण हेतु नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। हरे पौधे वातावरण से स्वयं नाइट्रोजन ग्रहण करने में असमर्थ होते हैं। हर पौधे नाइट्रोजन का अवशोषण NO3 (नाइट्रेट/ Nitrate), NO2 (नाइट्राइट/ Nitrite) और NH4+ (अमोनिया/ Ammonia) के रूप में करते हैं। नाइट्रोजन यौगिकीकरण करने वाला जीवाणु राइजोबियम चने, मटर, मूंगफली आदि की जड़ों में रहता है। वह भाग लेग्हीमोग्लोबिन(Leghemoglobin) की उपस्थिति के कारण गुलाबी रंग का हो जाता है। नाइट्रोजन स्थिरीकरण के समय नाइट्रोजीनेज(Nitrogenase) नामक एन्जाइम उत्प्रेरक का कार्य करता है।

उर्वरक(Fertilizers) : पौधे लगातार भूमि से आवश्यक तत्वों का अवशोषण करते रहते हैं। इस कारण मृदा में इन तत्वों की कमी हो जाती है। मृदा में मुख्यतः नाइट्रोजन, फास्पफोरस तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। इन तीनों तत्वों को एन.पी.के (NPK) कहते हैं। भारत में एन.पी.के. के मुख्य स्रोत हैं – अमोनियम क्लोराइड, अमोनियम नाइट्रेट अमोनियम स्लपफेट, सोडा नाइट्रेट, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, कैल्शियम मैग्नीशियम फॉस्पफेट। नाइट्रोफास्फेट में पोटाश की विभिन्न मात्राएं मिलाकर भी एन.पी.के. उर्वरक बनाए जाते हैं। उर्वरकों के थैलों पर 17-18-19 अथवा 15-15-15 के लेबल लगा दिए जाते हैं। ये अंकित संख्याएं नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटैशियम के प्रतिशत भार को प्रदर्शित करती है।

प्रकाश-संश्लेषण(Photo Synthesis) : स्वपोषी जीव वातावरण से सरल अणुओं को ग्रहण करके उनसे कार्बनिक पदार्थ का संश्लेषण करते हैं। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा उन्हें सूर्य के प्रकाश से प्राप्त होती है। अतः यह प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण कहलाती हैं।

प्रकाश

6CO2 + 12H2O  Chlorophyll    C6H12O6 + 6O2

प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्चे पदार्थ

  1. कार्बन डाइऑक्साइड, ii. जल, iii. पर्णहरित, iv. ताप

प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया विधि

प्रकाश-संश्लेषण बहुत जटिल जैव-रासायनिक प्रक्रिया है और इसमें अनेक अभिक्रियाएं होती हैं। यद्यपि प्रकाश-संश्लेषण की जटिल प्रक्रिया में CO2, जल, क्लोरोफिल, प्रकाश के अलावा अनेक विकर तथा रासायनिक पदार्थ भाग लेते हैं परन्तु दो पदार्थ ऐसे है जो आवश्यक हैं NADP तथा ADP

ADP+P उर्जा ATP

 NADP एक हाइड्रोजन-ग्राही पदार्थ है जो हाइड्रोजन को ग्रहण करके NADPH2 में परिवर्तित हो जाता है तथा बाद में CO2 को H देकर वापस NADP में परिवर्तित हो जाता है।

Photosynthesis की क्रिया दो Step में होती है।

  1. Lisht reaction Hill or reaction
  2. Dark reaction or calvin cycle
Bookmark(0)