9. परिसंचरण तंत्रा (Circulatory System)

परिसंचरण तन्त्रा (Circulation in Animals)

Animals have a blood circulatory system to carry the digested nutrients and oxygen taken from the atmosphere to all cells. The circulatory system is divided into two parts which are as follows-

जन्तुओं में पचे हुए पोषक पदार्थों तथा श्वसनांगों द्वारा वातावरण से ग्रहण की गई ऑक्सीजन को समस्त कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए रुधिर परिसंचरण तंत्रा होता है। परिसंचरण तन्त्रा को दो भागों में विभाजित किया जाता है जो निम्नलिखित हैं-

  1. रुधिर परिसंचरण तन्त्रा (Blood Vascular System) और 2. लसिका तन्त्रा (Lymphatic System)

Both transport mechanisms have three distinct characteristics –

  1. A circulating fluid commonly known as blood.
  2. A contracting organ through which fluid can be sent to the entire body. It can often be either a blood vessel or a heart.
  3. Tubes through which blood can travel in every part of the body. These are often called blood vessels.

These are named based on the composition and function of the blood vessels.

Labeled Diagram of Circulatory System
  1. Arteries: The blood vessels that carry the blood from the heart to the organs are called arteries.
  2. Arterioles: The last thin branches of the arteries are called arterioles.
  3. Blood Capillaries: The arteries are divided into many fine branches, which are possible to see only under microscope. It is always located between the cells of the tissues and at this place the exchange of substances takes place between the blood and capillaries.
  4. Small vein: Venous capillaries re-attach within the tissue and then form some large vessels. These are called small veins. It is only through small veins that the process of blood withdrawal begins.
  5. Veins: Small veins form veins together. They carry blood from the tissues to the heart.

दोनों परिवहन तन्त्रा में तीन विशिष्ट लक्षण होते हैं-

  1. एक भ्रमण करने वाला द्रव जिसे सामान्यतया रुधिर या रक्त(Blood) कहते हैं।
  2. एक संकुचनशील अंग जिसके द्वारा द्रव को समस्त शरीर में भेजा जा सके। यह प्रायः या तो रुधिर वाहिनी हो सकती है या हृदय।
  3. नलिकाएं जिनमें होकर रुधिर शरीर के प्रत्येक भाग में भ्रमण कर सके। इन्हें प्रायः रुधिर वाहिनियां (blood vessels) कहते है।

रुधिर वाहिनियों की रचना तथा कार्य के आधार पर इनका नाम रखा जाता है।

  1. धमनी (Arteries): वे रुधिर वाहिनियां जो रुधिर को हृदय से अंगों की ओर ले जाती है, धमनी कहलाती है।
  2. धमनिका (Arterioles): धमनियों की अंतिम महीन शाखाएं धमनिका कहलाती हैं।
  3. रुधिर केशिकाएं (Blood Capillaries): धमनिकाएं अनेक इतनी महीन शाखाओं में बंटी होती है जिसको सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखना सम्भव होता है। ये सदैव ऊतकों की कोशिकाओं के बीच में स्थित रहती है और इसी स्थान पर रुधिर तथा केशिकाओं के बीच पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
  4. लघु शिरा (Venule) : रुधिर केशिकाएं ऊतक के भीतर ही पुनः आपस में जुड़ी रहती है और फिर कुछ बड़ी वाहिनियों का निर्माण करती है। इन्हें लघु शिरा कहते हैं। लघु शिराओं द्वारा ही रुधिर वापसी की क्रिया प्रारंभ होती है।
  5. शिराएं (Veins): लघु शिराएं आपस में मिलकर शिराएं बनाती हैं। ये रुधिर को ऊतकों से लेकर हृदय की ओर ले जाती हैं।

Cardiovascular systemThe parts of human heart

The heart is a muscular cone-shaped hollow muscular organ with its base up and the apex down. The peak is inclined slightly to the left. The heart weighs about 300 grams. The heart is situated behind the middle sternum or breastbone of the lungs in the chest. Its shape is almost like a closed fist and it is divided into right and left parts by a wall. These two parts are further divided into two cells. The upper body is called the Auricle and the lower part is called the ventricle. Thus, there are two auricles and two ventricles. The heart of a human is four-legged. The ventricle is larger than the auricle in size and the ventricular wall is also much thicker than the auricle. The auricle and ventricle are connected to each other by gates. This gate is protected by valves. The right-side valve is tricuspid, and the left side is bicupid which is called mitral valve. Blood from the atrial ventricle valve can only flow from the auricle to the ventricle and not in the opposite direction. The tricuspid valve is made up of three cusps and the mitral valve of two cusps.

The heart envelope or pericardium is closed within a double cell, the seismic fluid between the two layers of this shell keeps these folds smooth, allowing the heart to move freely.

There are three layers of the heart wall, the outer layer called pericardium, the middle layer called myocardium and the inner layer of epithelium called endocardium.

हृदय कार्य पद्धति(Cardiovascular system)

हृदय एक पेशी का बना शंकु (Cone) के आकार का खोखला मांसल अंग है जिसका आधार उपर होता है और शिखर (apex) नीचे। शिखर का झुकाव थोड़ा बांयी ओर होता है। हृदय का वजन लगभग 300 ग्राम होता है। हृदय वक्ष में फेफड़ों के मध्य उरोस्थि(Sternum or breastbone) के पीछे स्थित होता है। इसका आकार लगभग बन्द मुठ्ठी के समान होता है एक भित्ती द्वारा यह दायें और बायें भागों में विभाजित होता है। ये दोनों भाग पुनः दो कोष्ठों में बँटे होते हैं। उपर का कोष्ठ ‘अलिंद’(Auricle) तथा नीचे का कोष्ठ निलय(Ventricle) कहलाता है। इस प्रकार दो आलिंद तथा दो निलय होते हैं। मनुष्य का हृदय चार कोष्ठीय होता है। आकार में निलय अलिंद से बड़ा होता है तथा निलय की दीवार भी अलिंद से बहुत मोटी होती है। अलिंद और निलय एक दूसरे से द्वारों द्वारा जुड़े होते है। यह द्वार कपाटों(Valve) द्वारा सुरक्षित रहता है। दाँयी ओर का कपाट त्रिकपर्दी(Tricuspid) होता है, तथा बांयी ओर का कपाट द्विकपर्दी (Bicupid) जो माइट्रल वाल्व (Mitral Valve)कहलाता है। अलिन्द-निलय वाल्व में से रक्त केवल अलिन्द से निलय की ओर प्रवाहित हो सकता है इसके विपरीत दिशा में नहीं। त्रिकपदी वाल्व तीन कपर्दिकाओं (Cusps) तथा माइट्रल वाल्व दो कपर्दिकाओं से बनता है।

हृदय आवरण अथवा पैराकार्डियम एक दोहरे कोश के भीतर बन्द होता हैं इस कोश की दोनों तहों के बीच में विद्यमान सीमिक तरल इन तहों को चिकना रखता है जिससे हृदय मुक्त रूप से गतिशील बना रहता है।

हृदय की भित्ति की तीन परतें होती हैं पेरिकार्डियन नामक बाहरी परत, मायोकार्डियम नामक मध्य परत तथा एण्डोकार्डियम नामक उपकला की भीतरी परत होती है।

Blood vessels associated with the heart:

Upward and inferior blood vessels pour their blood into the right auricle. The lower placenta where the right auricle opens in the auricle, the place or semilunar valve of Eustachius, helps to maintain blood flow in the proper direction. The pulmonary arteries carry blood from the right ventricle to the lungs and from there the blood goes to the left auricle by four pleural veins. Blood flows from the left ventricle into the ‘aorta’. The aorta and pulmonary artery are protected by semi-circular valves. The valve between the left ventricle and the aorta is called the aortic valve and prevents blood from going back to the left ventricle from the aorta. The valve between the right ventricle and the pulmonary artery is called the pulmonary valve and prevents blood from going into the right ventricle from the pulmonary artery in the opposite direction.

The return of blood from the heart tissue is mainly through the ‘coronary sinus’ which opens directly into the right auricle. The heart acts like a pump. The activities related to circulation of blood which occur in the heart are collectively called the heart cycle. The valve of auricle and ventricle are divided into two parts. Systole and diastole.

In systole, the heart cells shrink and in diastole the cells fill with blood and swell. The systole of both atoms is together. The diastole of both atoms is also the same time. The same applies to the ventricles. Ventilation or systole is 0.3 seconds and diastole is 0.5 seconds. This sequence continues day and night throughout the life.

Some of the characteristics of the heart muscle contraction is due to which the heart pump expels the blood in its cells. These cells are replenished with blood at the time of diastole. Conductivity Rhythm in which there is automatic rhythmic contraction without any neural effect.

हृदय से संबद्ध रक्त वाहिकाएँ: उर्ध्व और निम्न महाशिराएँ अपना रक्त दायें अलिंद में डालती हैं। निम्न महाशिरा जहाँ दायें अलिंद में खुलती है, उस स्थान या यूस्टेशियस का अर्द्धचन्द्र वाल्व (Semilunar Valve of Eustachius) उचित दिशा में रक्त प्रवाह बनाये रखने में सहायक होता है। फुस्फुस धमनी दायें निलय से रक्त फेफड़ों तक ले जाती है तथा वहाँ से रक्त चार फुस्फुस शिराओं द्वारा बायें अलिंद में जाता है। बांयें निलय से रक्त ‘एओर्टा’ अथवा महाधमनी में प्रवाहित होता है। एओर्टा तथा फुफ्फुस के धमनी द्वारा अर्द्धचन्द्र  वाल्वों द्वारा सुरक्षित रहते हैं। बांये निलय तथा महाधमनी के बीच का वाल्व एओर्टिक वाल्व कहलाता है तथा रक्त को एओर्टा से वापस बायें निलय में जाने से रोकता है। दायें निलय और फुफ्फुस धमनी के बीच का वाल्व फुफ्फुस वाल्व (Pulmonary Valve) कहलाता है तथा रक्त को विपरीत दिशा में फुफ्फुस धमनी से दायें निलय में जाने से रोकता है।

हृदय उतक से रक्त की वापसी मुख्यतः ‘कारोनरी साइनस’ द्वारा होती है जो सीधे दायें अलिंद में खुलता है। हृदय एक पम्प के समान कार्य करता है। रक्त के परिसंचरण से संबंधित क्रियाएँ जो हृदय में होती हैं, उसे सम्मिलित रूप से हृदय चक्र कहा जाता है। अलिन्द और निलय की क्रिया के दो भागों में विभक्त किया गया है। प्रंकुचन या सिस्टोल (Systole) तथा अनुशिथिलन या डायस्टोल (Diastole)|

सिस्टोल में हृदय के कोष्ठ सिकुड़ते हैं तथा डायस्टोल में कोष्ठ रक्त से भरकर फूल जाते हैं। दोनों अलिंदों का सिस्टोल एक साथ होता है। दोनों अलिंदों का डायस्टोल भी एक ही समय होता है। यही बात निलयों पर भी लागू होती है। निलय का प्रंकुचन या सिस्टोल 0.3 सेकण्ड तथा अनुशिथिलन कुछ अधिक 0.5 सेकेण्ड रहता है। यही क्रम जीवन पर्यन्त दिन रात चलता रहता है।

हृदय पेशी की कुछ विशेषताओं में संकुचन शीलता जिसके कारण हृदय रूपी पम्प अपने कोष्ठों में रक्त को निष्कासित कर देता है। डायस्टोल के समय ये कोष्ठ रक्त से पुनः भर जाते हैं। चालकता (Conductivity) ताल (Rhythm) जिसमें बिना किसी तन्त्रिका प्रभाव के उसमें स्वचालित ताल बद्ध संकुचन होता रहता है।

Arterial Pulse: This is a wave of excess pressure that appears in the arteries when a heart pump pushes blood out. The vibrations we experience when touching a pulse are not due to the blood being pushed into the aorta by the heart, but because of blood pressure in the aorta. The pulse speed is related to the cardiac cycle. If the pulse speed is 70, then the heartbeat is also 70 times in a minute. Normal range of pulse speed (beats per minute)

धमनी नाड़ी (Arterial Pulse): यह अधिक दाब की एक लहर है जो धमनियों में उस समय प्रकट होती है, जब हृदय रूपी पम्प रक्त को बाहर धकेलता है। नाड़ी का स्पर्श करते समय जो स्पन्दन अनुभव होता है, वह हृदय द्वारा महाधमनी में धकेले गये रक्त के पहुँचने के कारण नहीं बल्कि एओर्टा में रक्तदाब के कारण होता है। नाड़ी की गति हृदय चक्र से संबंधित होती है। नाड़ी की गति 70 हो तो हृदय की धड़कन भी एक मिनट में 70 बार होती है। नाड़ी की गति का सामान्य परिसर (beats प्रति मिनट)

In newborn (नवजात शिशु में) 140                   At five (पाँच वर्ष पर) 96-100

In the first year (प्रथम वर्ष में) 120                   At ten (दस वर्ष पर) 80-90

In the second year (द्वितीय वर्ष में) 110           In adult (व्यस्क व्यक्ति में) 60-80

At rest, the heart beats about 70 times per minute and pushes up to 70ml of blood each time. Thus, the volume of blood pumped in one minute is 70 × 70ml ie about 5 liters. Just as much blood is pushed out of the heart, as much blood comes back into the heart by veins per minute. If there is no balance of venous return and heart development per vein and if the ventricles are not able to expel all the blood coming into the heart, then a condition of heart failure arises.

विश्राम के समय हृदय लगभग 70 बार प्रतिमिनट धड़कता है तथा हर बार 70ml रक्त धकेलता है। इस प्रकार एक मिनट में पम्प किये गये रक्त का परिमाण 70×70ml अर्थात् लगभग 5 लीटर होता है। हृदय जितना रक्त बाहर धकेलता है ठीक उतना ही रक्त प्रति मिनट शिराओं द्वारा हृदय में वापस आता है। प्रति शिरा प्रति गमन(Venous return) और हृदय विकास का संतुलन न रहे और निलय हृदय में आने वाले सारे रक्त को निष्कासित न कर पाये तो हृदयपात (Heart failure) की स्थिति पैदा हो जाती है।

Circulation of blood: From the left auricle, the blood comes into the aorta, which is the largest artery of the body. Many small arteries come out of this aorta that go to different parts of the body. Due to contraction or relaxation of the muscle wall of the arteries, the size of the arteries keeps on increasing as required. In this way, arterial blood pressure helps to remain stable and blood flow in the cells is controlled. Due to the thinning of the cell wall, there is a mutual exchange of plasma and interstitial fluid. The veins take the form of two vena cava intermingling. The first half is Inferior vena cava which collects blood from the torso and lower branches. And the second is superior vena cava which collects blood from the head and upper branches. These two vena cava open in the right auricle of the heart.

रक्त का परिसंचरण: बायें अलिन्द से रक्त महाधमनी अथवा एओर्टा में आता है, जो शरीर की सबसे बड़ी धमनी है। इस महाधमनी से अनेक छोटी धमनियाँ निकलती हैं जो शरीर के विभिन्न भागां तक जाती हैं। धमनियाँ की भित्ति पेशी के संकुचन अथवा शिथिलन के कारण धमनियों का आकार आवश्यकतानुसार न्यूनाधिक होता रहता है। इस प्रकार धमनीय रक्त दाब के स्थिर रहने में सहायता मिलती है तथा कोशिकाओं में रक्त का प्रवाह नियन्त्रित हो पाता है। कोशिकाओं की भित्ति के पतली होने के कारण प्लाज्मा और अन्तराली तरल का परस्पर विनिमय होता रहता है। शिराएं आपस में मिलते-मिलते दो महाशिराओं(two vena cava) का रूप ले लेती हैं। पहली अधः महाशिरा (Inferior vena cava) है जो धड़ तथा निचली शखाओं से रक्त एकत्रित करती हैं। तथा दूसरी उफर्ध्व महाशिरा (Superior vena cava) है जो सिर तथा उपरी शाखाओं से रक्त एकत्रित करती है। ये दोनों महाशिराएँ हृदय के दाये अलिंद में खुलती है।

Pleural circulation: Blood from the right auricle travels to the right ventricle and when it is compressed is pushed into the pleural artery. The pleural artery divides the blood into the right-left pleura. Impure blood flows to the pulmonary artery. Blood flows in the arteries at high pressure, this pressure is called Systolic Pressure. This pressure arises from contraction of the ventricles. Diastolic pressure is produced as a result of ventricular diastole. If there is a permanent increase in blood pressure due to temporary increase in systolic pressure due to any reason, then it is called high blood pressure or hyper tension. As the amount of cholesterol in the blood increases, it accumulates on the inner wall of the arteries, causing the arteries to become narrower and tighter, which is called Arteriosclerosis. As a result, blood pressure also increases.

Lack of blood in the body, bleeding or loss of heart function leads to a disease called ‘Low blood pressure’ or Hypotension.

Veins bring impure blood from all parts of the body to the heart, but an exception is the pulmonary vein in which pure blood flows.

फुफ्फुस परिसंचरण: दायें अलिन्द से रक्त दायें निलय में जाता है और उसके संकुचित होने पर फुफ्फुस धमनी में धकेल दिया जाता है। फुफ्फुस धमनी दो भागों में विभाजित होकर रक्त को दायें-बायें फुफ्फुस में ले जाती है। फुफ्फुसीय धमनी में अशुद्ध रक्त प्रवाहित होता है। धमनियों में रक्त उच्च दाब पर बहता है, इस दाब को प्रकुंचन दाब (Systolic Pressure) कहते हैं। यह दाब निलयों के संकुचन से उत्पन्न होता है। निलय के अनुशिथिलन के फलस्वरूप अनुशिथिलन दाब (Diastolic Pressure) उत्पन्न होता है। किसी कारणवश प्रकुंचन दाब में अस्थायी वृद्धि होने पर यदि रक्त दाब में स्थायी वृद्धि हो जाये तो इसे उच्च रक्त दाब (High Blood Pressure) या हाइपर टेन्सन कहते हैं। रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाने से यह धमनियों की भीतरी दीवार पर जम जाता है जिससे धमनियाँ सँकरी और कड़ी हो जाती हैं, इसे ‘आर्टेरियोस्क्लेरोसिस’ (Arteriosclerosis) कहते हैं। इसके फलस्वरूप भी रक्तदाब बढ़ जाता है।

शरीर में रक्त की कमी, रक्तस्राव या हृदय की कार्य क्षमता में कमी आने से ‘निम्न रक्त दाब’ (Low blood pressure) या हाइपोटेन्शन (Hypotension) नामक रोग हो जाता है।

शिराएं शरीर के समस्त अंगों से अशुद्ध रक्त हृदय में लाती हैं लेकिन फुफ्फुसीय शिरा इसका अपवाद है जिसमें शुद्ध रक्त बहता है।

The blood is usually red thick, salty in taste and opaque. Through the heart and blood vessels, it revolves continuously throughout the body. Therefore, the amount of blood in the entire body is 6-7% of the body weight. The origin of blood is from the mesoderm of the embryo. It has two components:

  1. Plasma: It is the unbroken liquid part of the blood. There are different types of blood floating in it. The main part of the plasma is water, but some substances also dissolve in it. The main among these substances are: water-85 to 90%, proteins 7%, salts 9%, glucose 0.1%, the remaining substances are found very less in it.

There is a special type of compound in the cytoplasm of red blood cells called haemoglobin. The red colour of blood cells is due to this substance.

Haemoglobin contains iron-containing globin. They have the unique ability to associate with oxygen. It combines with oxygen to form a special substance called oxy-haemoglobin. It is a temporarily formed compound that decomposes into parts with less oxygen and liberates oxygen.

Haemoglobin + oxygen = oxy-haemoglobin

2. Blood Corpuscle: There are three types

    1. RBC: Humans and other mammals do not have Nucleus in their RBCs, all else occur in Vertebrate. It has a pigment called Haemoglobin which is why it is red in colour. This pigment does not happen in the WBC and that is why WBC suffers. 50 million cubic mm is found in RBC male and 45-50 million cubic mm in female. Its life span is 20–120
    2. WBC: It is spherical and nucleated. The ratio of RBC and WBC is 600: 1. The life span is 2-4
    3. Platelets: They are found only in mammals, its lifespan is 3-5

रुधिर प्रायः लाल गाढ़ा, स्वाद में नमकीन तथा अपारदर्शी होता है। यह हृदय तथा रुधिर वाहिनियों में होकर सम्पूर्ण शरीर में लगातार परिक्रमा करता रहता है। अतः सम्पूर्ण शरीर में रुधिर की मात्रा शरीर के भार का 6-7% होती है। रुधिर की उत्पत्ति भू्रण की मीसोडर्म से होती है। इसके दो अवयव हैंः

  1. प्लाजमाः यह रुधिर का अजीवित तरल भाग होता है। इसमें विभिन्न प्रकार के रुधिराणु तैरते रहते हैं। प्लाज्मा का मुख्य भाग जल है, परन्तु इसमें कुछ पदार्थ भी घुले रहते हैं। इन पदार्थों में प्रमुख हैं: जल-85 से 90%, प्रोटींस 7%, लवण 9%, ग्लूकोस 0.1% शेष पदार्थ इसमें बहुत कम पाए जाते हैं।

लाल रुधिराणुओं के कोशिका-द्रव्य में एक विशेष प्रकार का यौगिक होता है जिसे हीमोग्लोबिन कहते हैं। रुधिराणुओं का लाल रंग इसी पदार्थ के कारण होता है।

हीमोग्लोबिन में लौहयुक्त ग्लोबिन होता है। ये ऑक्सीजन से संयोग करने की अपूर्व क्षमता रखते हैं। ऑक्सीजन से मिलकर यह एक विशेष पदार्थ बनाती है जिसे ऑक्सी-हीमोग्लोबिन कहते हैं। यह अस्थायी रूप से बना यौगिक है जो कम ऑक्सीजन वाले भागों में विघटित होकर ऑक्सीजन को स्वतंत्रा कर देता है।

हीमोग्लोबिन+ऑक्सीजन = ऑक्सी-हीमोग्लोबिन

2. Blood Corpuscle: यह तीन प्रकार के होते हैं

    1. RBC: मनुष्य और अन्य स्तनधरियों के RBC में Nucleus नहीं होते बाकी सभी Vertebrate में होते हैं। इसमें Haemoglobin नामक एक Pigment होता है इसी कारण लाल रंग होता है। यह Pigment WBC में नहीं होता इसी कारण WBC सपेफद होता है। RBC पुरूष में 50 लाख घन mm तथा स्त्रा में 45-50 लाख घन mm पाये जाते हैं। इसका जीवन काल 20-120 दिन तक होता है।
    2. WBC: यह गोलाकार एवं Nucleated होता है। RBC एवं WBC का अनुपात 600:1 होता है जीवन काल 2-4 दिन होते हैं।
    3. प्लेटलेटसः यह केवल स्तनधरियों में पाए जाते हैं इसका जीवनकाल 3-5 दिन होता है।

Blood work:

  1. With the help of haemoglobin, the blood carries O2 absorbed from the atmosphere to various tissues of the body and carries the released CO2 back to the excretory organs.
  2. Transport of nutrients, excretory substances, hormones etc. is possible by blood.
  3. The blood maintains the heat by spreading the heat of the body throughout the body.
  4. White blood cells protect against diseases by eating bacteria, viruses etc.
  5. Blood clotting and wound healing.

रुधिर का कार्यः

  1. हीमोग्लोबिन के सहायता से रक्त वायुमण्डल से अवशोषित O2 को शरीर के विभिन्न ऊतकों को पहुंचाता है तथा विमुक्त CO2 को वापिस उत्सर्जी अंगों में ले जाता है।
  2. पोषक पदार्थों, उत्सर्जी पदार्थों, हार्मोन्स आदि का परिवहन रुधिर द्वारा ही संभव होता है।
  3. रुधिर शरीर की ऊष्मा को सारे शरीर में फैला कर ताप को एक-सा बनाए रखता है।
  4. श्वेत रुधिर कणिकाएं जीवाणुओं, विषाणुओं आदि का भक्षण करके रोगों से रक्षा करती है।
  5. रुधिर थक्का जमाने तथा घाव भरने का कार्य करता है।

Blood pressure: The heart acts like a pump and throws blood into the arteries with each heartbeat, which already increases blood pressure due to already having blood. The pressure with which blood flows through the heart into the arteries is called blood pressure.

The blood pressure is high during the contraction of the ventricles in the heart and this is called systolic blood pressure. But during the relaxation of the ventricles, the blood pressure in the arteries remains low. This is called diastolic blood pressure.

Systolic blood pressure of a normal human is 110–140 mm and diastolic blood pressure is equal to 10–80 mm of mercury pressure. In a normal person, the systolic pressure is equal to (80+ years of age).

Clotting of blood is a complex chemical process that is completed in the following steps:

First stage

  1. The damaged tissue releases a lipoprotein called thromboplastin.
  2. A platelet element by dissolving blood platelets released from damaged blood cells. Now the calcium ions and plasma proteins present in the plasma form an enzyme called prothrombinase.

Second stage

  1. Plasma contains a substance called heparin that does not allow blood to freeze. It must be inactive. Hence prothrombinase in the presence of Ca ++, inactivates heparin.
  2. It also converts inactive proteins called prothrombin into active thrombin.

Third stage

  1. Soluble fibrinogen present in plasma is converted into fibrin molecules activated by thrombin. Fibrin molecules combine to form thin fibers. They form a dense net covering the injury. In this trap, the blood particles puff up and the red clot freezes.

Benefit from blood clotting

  1. There is no further loss of blood from the body.
  2. Germs from the injured part do not enter the body.
  3. The wound healing process in the tissue also begins

रक्त दाबः हृदय एक पम्प की तरह कार्य करता है तथा प्रत्येक धड़कन के साथ धमनियों में रक्त फेंकता है जिनमें पहले से ही रक्त होने से रुधिर दाब बढ़ जाता है। रक्त जितने दबाव के साथ हृदय द्वारा धमनियों में प्रवाहित होता है उसे रक्त दाब कहते हैं।

हृदय में निलय के संकुचन के समय रुधिर का दबाव अधिक होता है तथा यह प्राकुंचन रुधिर दाब (Systolic Blood Pressure) कहलाता है। किंतु निलय के शिथिलन के समय धमनियों में रुधिर का दबाव कम रह जाता है। इसको अनुशिथिलन रुधिर दाब (Diastolic Blood Pressure) कहते हैं।

सामान्य मनुष्य का प्राकुंचन रक्त दाब 110-140 मि.मी. एवं अनुशिथिलन रक्त दाब 10-80 मिमी पारे के दाब के बराबर होता है। सामान्य व्यक्ति में प्राकुंचन दाब (80+आयु वर्षों) के बराबर होता है।

रक्त का जमना (Clotting of Blood)  एक जटिल रसायनिक प्रक्रिया है जो निम्नलिखित चरणों में पूरी होती हैः

प्रथम चरण

  1. क्षतिग्रस्त ऊतक से थ्रोम्बोप्लास्टिन नामक लाइपोप्रोटीन विमुक्त होती है।
  2. क्षतिग्रस्त रुधिर कोशिकाओं से निकल रुधिर प्लेटलेट्स का विघटन होकर एक प्लेटलेट तत्व। अब प्लाज्मा में उपस्थित कैल्शियम आयनों तथा प्लाज्मा प्रोटीन से मिलकर प्रोथ्रोम्बिनेज नामक एंजाइम बनाते हैं।

द्वितीय चरण

  1. प्लाज्मा में हिपैरिन नामक एक पदार्थ होता है जो रक्त को जमने नहीं देता है। इसका निष्क्रिय होना आवश्यक है। इसलिए Ca++ की उपस्थिति में प्रोथ्रोम्बिनेज, हिपैरिन को निष्क्रिय कर देता है।
  2. साथ ही प्रोथ्रोम्बिन (Prothrombin) नामक निष्क्रिय प्रोटीन को सक्रिय थ्रोम्बिन में बदल देता है।

तृतीय चरण

  1. प्लाज्मा में उपस्थित घुलनशील फाइब्रिनोजन नामक प्रोटीन को थ्रोम्बिन द्वारा सक्रिय फाइब्रिन अणुओं में बदल दिया जाता है। फाइब्रिन के अणु मिलकर पतले रेशे बना लेते हैं। इनसे एक घना जाल बनकर चोट को ढक लेता है। इस जाल में रुधिर के कण पफंस जाते हैं और लाल थक्का जम जाता है।

रक्त जमने से लाभ

  1. शरीर से रक्त की और अधिक हानि नहीं हो पाती है।
  2. चोटग्रस्त भाग से रोगाणु शरीर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं।
  3. ऊतक में घाव भरने की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाती है।

Lymph: Lymph is a fluid similar to blood. Proteins, glucose, water, amino acids, salts and other foods are dissolved in its plasma. In lymphatic plasma, lymph nodes and granulocytes float. There is a complete lack of red blood cells in it and carbonic acid is transported in the lymph. It has relatively low oxygen content. Like the blood circulation system, there is lymphatic circulatory system in the body in which lymphatic fluid only moves from the organs to the heart.

Lymphatic functions:

  1. The part of tissue cells where the blood cells do not reach there, lymphatic cells receive nutrients and oxygen from the blood cells by diffusion to the tissue capillaries. Also, the tissue carries CO2 and other excretory substances from the capillaries to the blood cells.
  2. The lymphatic system returns the plasma diffused from the blood cells to the blood capillaries.
  3. White blood cells present in lymphatic system provide protection by eating germs.
  4. The lymphatic capillaries also absorb fat in the small intestine.
  5. Due to the lymphatic surrounding of the tissue cells, an aqueous environment is created so that the osmosis is maintained outside and inside the cell.

लसीका(Lymph): लसीका रुधिर से मिलता-जुलता द्रव है। इसके प्लाज्मा में प्रोटीन, ग्लूकोस, जल, ऐमिनो अम्ल, लवण तथा अन्य खाद्य पदार्थ घुले रहते हैं। लसीका प्लाज्मा में लसिका कणिकाएं तथा ग्रेन्यूलोसाइट तैरते रहते हैं। इसमें लाल रुधिराणुओं का सर्वथा अभाव रहता है तथा लसीका में कार्बोनिक अम्ल का परिवहन होता है। इसमें ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। रुधिर परिसंचरण तन्त्रा की तरह शरीर में लसीका परिसंचरण तन्त्रा होता है जिसमें लसीका द्रव केवल अंगों से हृदय की ओर बढ़ता है।

लसीका के कार्यः

  1. ऊतक कोशिकाओं का वह भाग जहां रुधिर कोशिकाएं नहीं पहुंचती वहां लसीका कोशिकाएं रुधिर कोशिकाओं से पोषक पदार्थ एवं ऑक्सीजन को विसरण द्वारा प्राप्त करके ऊतक केशिकाओं तक पहुंचाती है। साथ ही, ऊतक केशिकाओं से CO2 एवं अन्य उत्सर्जी पदार्थों को लेकर रुधिर कोशिकाओं में पहुंचा देती है।
  2. लसीका तन्त्रा रुधिर कोशिकाओं से विसरित प्लाज्मा को रुधिर केशिकाओं में वापस पहुंचाता है।
  • लसीका तन्त्रा में उपस्थित श्वेत रुधिर कणिकाएं, रोगाणुओं का भक्षण करके सुरक्षा प्रदान करती है।
  1. लसीका केशिकाएं छोटी आंत में वसा का भी अवशोषण करती है।
  2. ऊतक कोशिकाओं के चारों ओर लसीका के रहने से जलीय वातावरण बना रहता है ताकि कोशिका के बाहर व भीतर परासरण संतुलना बना रहे।

मनुष्यों में रुधिर वर्ग (Blood Group of Humans)

Blood group of humans: Land Steiner discovered in 1900 AD that the blood of all humans is different and not similar. The main reason for this variation is the presence of a special type of protein (Glycoproteins) in the red blood cells of the blood called antigen which is of two types – i) antigen A, ii) antigen B

In fact the letters A&B denote two different types of antigens. There are four types of blood groups in humans based on the presence of these glycoproteins in red blood cells.

  1. Contains antigen A – blood group A
  2. which contains antigen B – blood group B
  3. In which there are both antigen A and B – blood group AB
  4. In which there is no antigen of either – blood group O

In the absence of any antigen, an opposite type of protein is found in blood plasma. This is called an antibody. Thus the distribution of antibodies along the four sections of the blood is in the following manner:

मनुष्य का रक्त वर्गः लैंड स्टीनर ने सन 1900 ई. में पता लगाया कि सभी मनुष्यों का रुधिर एक समान न होकर भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। इस भिन्नता का मुख्य कारण रुधिर की लाल रुधिर कणिकाओं में एक विशेष प्रकार की प्रोटीन (Glycoproteins) की उपस्थिति है जिसे एण्टीजन कहते हैं जो कि दो प्रकार के होते है – i) एण्टीजन A, ii) एण्टीजन B

वास्तव में अक्षर A&B दो विभिन्न प्रकार की एण्टीजनों को निरुपित करते हैं। लाल रुधिराणुओं में इन ग्लाइको प्रोटीनों की उपस्थिति के आधार पर मनुष्य में चार प्रकार के रुधिर वर्ग होते हैं।

  1. जिसमें एण्टीजन A होता है – रुधिर वर्ग A
  2. जिसमें एण्टीजन B होता है – रुधिर वर्ग B
  3. जिनमें एण्टीजन A और B दोनों होते हैं – रुधिर वर्ग AB
  4. जिसमें दोनों में से कोई एण्टीजन नहीं होता है – रुधिर वर्ग O

किसी एण्टीजन की अनुपस्थिति में एक विपरीत प्रकार की प्रोटीन रुधिर के प्लाज्मा में पाई जाती है। इसको एण्टीबॉडी कहते हैं। इस प्रकार रुधिर के चारों वर्गों के साथ एण्टीबॉडी का वितरण निम्नलिखित ढंग से होता है-

रुधिर वर्ग लाल रक्त कोशिकाओं(R.B.C) पर एंटीजन (Antigen present on the red blood cells) रुधिर प्लाज्मा में

एण्टीबॉडी (Antibody in blood plasma)

A

B

AB

O

केवल A

केवल B

AB दोनों (both)

कोई नहीं (neither)

केवल B

केवल A

कोई नहीं neither

AB दोनों (both)

 

Blood Bank: Blood banks can be kept in the same form for 30 days. Plasma can be dried and kept in powder form. Later it can be used by mixing distilled water. Modern scientists have used ‘polyvinyl pyrrolidone’ in place of blood.

Some diseases caused by pathology in human genes:

Albinism: The skin and hair are white due to lack of melanin, pink or red appearance of the pupils due to blood cells. Melanin is made with the help of the enzyme tyrosinase. This enzyme is formed by the influence of a gene.

Alkaptonuria: Its patients are not able to fructify the ‘Homo Niantic Acid’ which is made in the body. The amount of this acid increases in the blood. Arthritis occurs due to its deposition in the joints. The enzyme required for fission of nomogenetic acid is synthesized under the control of a dominant gene. Those people in which this gene is dormant, they have this disease.

रुधिर बैंक (Blood Bank): बैंकों में रुधिर को 30 दिन तक उसके उसी रूप में रखा जा सकता है। प्लाज्मा को सूखाकर पाउडर के रूप में रख सकते हैं। बाद में इसमें आसुत जल मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने रुधिर के स्थान पर ‘पॉलीविनाइल पाइरोलिडॉन’ का सपफल उपयोग किया है।

मानव जीनों में विकृति से उत्पन्न होने वाले कुछ रोग :

रंजकहीनता(Albinism): मिलैनिन की कमी से त्वचा तथा बालों का सफेद होना, रुधिर कोशिकाओं के कारण पुतलियों का गुलाबी या लाल दिखायी पड़ना। मिलैनिन ‘टाइरेसिनेज’ एंजाइम की सहायता से बनता है। यह एंजाइम एक जीन के प्रभाव से बनता है।

एल्कैप्टोनूरिया(Alkaptonuria): इसके रोगी शरीर में ही बनने वाले ‘होमो नेन्टीसिक अम्ल’ का विखण्डन नहीं कर पाते हैं। रुधिर में इस अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है। जोड़ों में इसके जमाव से गठिया रोग हो जाता है। होमोजेन्टीसिक अम्ल के विखण्डन के लिए आवश्यक एन्जाइम एक प्रबल जीन के नियन्त्राण में संश्लेषित होता है। जिन मनुष्यों में यह जीन सुप्त होता है, उन्हीं को यह रोग होता है।

Rh-factor: Landsteiner and Wiener discovered the presence of an antigen in the art of the rhesus monkey red blood cells and called it the rhesus element or antigen. In Indians, this element is found in 97% of individuals. Individuals, where this element is not found inside, are called Rh negative (Rh-). Humans do not have Rh-antibodies in their blood, but if a Rh-is transfused to a Rh + in the bloodstream, the plasma of the malignant slowly becomes Rh antibody. But if the blood of Rh + is re-transfused it then the death of the fatalist can occur.

Characterization of Rh element is also genetic. It is characterized by two allele genes (R, r), according to Mendelian rules. In this, gene R (Rh + traits) prevails over gene r (Rh-traits).

Erythroblastosis phyllites: Rh is a disease related to the element that dies in infants shortly after birth. Such babies are always Rh+. His mother is Rh- and father is Rh+.

Rh-कारक (Rh-factor): लैण्डस्टीनर एवं वीनर ने रीसस बन्दर के लाल रुधिराणुओं की कला में एक प्रतिजन की उपस्थिति का पता लगाया और इसे ही रीसस तत्व (Rhesus) या प्रतिजन का नाम दिया। भारतीयों में यह तत्व 97% व्यक्तियों में पाया जात है। जिन व्यक्तियों के अन्दर यह तत्व नहीं पाया जात, उन्हें Rh निगेटिव (Rh-) कहते हैं। मनुष्य के रुधिर में Rh-प्रतिरक्षी (Rh-antibodies) नहीं होते, लेकिन यदि रुधिर आधात में किसी Rh- को किसी Rh+ का रुधिर चढ़ा दिया जाता है तो घातक के प्लाज्मा में धीरे-धीरे Rh प्रतिरक्षी बन जाते हैं। लेकिन यदि Rh+ का रुधिर उसे दुबारा चढ़ा दिया जाये तो घातक की मृत्यु हो सकती है।

Rh तत्व का लक्षण भी आनुवंशिक होता है। इसकी वंशागति मेन्डेलियन नियमों के अनुसार, दो एलली जीन्स (R,r) द्वारा होती है। इसमें जीन R (Rh+लक्षण) जीन r (Rh-लक्षण) पर प्रबल होता है।

एरिथ्रोब्लासटोसिस फीटैलिस: Rh तत्व से संबंधित रोग है जो केवल शिशुओं में जन्म के शीघ्र बाद मृत्यु हो जाती है। ऐसे शिशु सदा Rh+ होते है। इनकी माता Rh- तथा पिता Rh+ होता है।

Cardiovascular disease

Pericarditis: In this condition there is inflammation in the membrane covering the heart and fluid gets collected in the pericardium. As a result, the heart does not have free movement. The pericardium gradually becomes thick and hard and the heart starts to tighten, due to which the heart does not spread and the blood does not fill up completely. This condition is called narrowing cardiovascular inflammation.

Endocarditis: This disease occurs due to inflammation in the endocardium covering the inner part of the heart cells. This can happen in Rheumatic fever. It affects the mitral valve.

Coronary artery disease: Due to the gradual narrowing of the coronary artery, it can be closed or blocked suddenly due to the extra thrombus. In this way, the blood supply of the heart muscle decreases due to which the heart muscle is endemic anaemia and the patient has chest pain or heart colic.

Congestive heart failure: This condition is caused by the failure of the heart’s pumping function. The patient has difficulty in breathing and fluid gets collected in soft tissues.

हृदय संबंधी रोग

हृदयावरण शोथ (Pericarditis): इस दशा में हृदय को ढकने वाली झिल्ली में सूजन आ जाती है ओर हृदयावरण कोश (Pericardium) में तरल एकत्रित हो जाता है। पफलस्वरूप हृदय की मुक्त गति नहीं हो पाती। हृदयावरण (पेरिकार्डियम) धीरे-धीरे मोटा और कठोर हो जाता है तथा हृदय को कसने लगता है, इस कारण हृदय फैल नहीं पाता और उसमें रक्त पूरी तरह नहीं भर पाता। इसी अवस्था को संकीर्णकारी हृदयावरण शोथ कहते हैं।

अन्तःहृदयशोथ (Endocarditis): हृदय कोष्ठों को भीतर की ओर से ढकने वाली कला एण्डोकार्डियम में सूजन आ जाने से यह रोग हो जाता है। ऐसा रुमेटी ज्वर (Rheumatic fever) में हो सकता है। यह माइट्रल वाल्व को प्रभावित करता है।

कोरोनरी धमनी रोग(Coronary artery disease): कोरोनरी धमनी के धीरे-धीरे संकीर्ण होते रहने से अतिरिक्त घनास्र (Thrombus) के कारण यह एकाएक बंद या अवरुद्ध हो सकती है। इस प्रकार हृदय पेशी का रक्त संभरण (Supply) घट जाता है जिससे हृदय पेशी स्थानिक अरक्तता तथा रोगी की छाती में पीड़ा या हृदय शूल होता है।

रक्त संकुल हृदपात (Congestive heart failure): यह अवस्था हृदय की पम्प-क्रिया के असफल रहने के कारण होती है। रोगी को श्वास में कष्ट होता है तथा कोमल उतकों में तरल एकत्रित हो जाता है।