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कंप्यूटर का परिचय(Introduction to Computers) 

कंप्यूटर क्या हैं ? (What is Computer)

Computer एक ऐसा Electronic Device है जो User द्वारा Input किये गए Data में प्रक्रिया करके सूचनाओ को Result के रूप में प्रदान करता हैं, अर्थात् Computer एक Electronic Machine है जो User द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करती हैं| इसमें डेटा को स्टोर, पुनर्प्राप्त और प्रोसेस करने की क्षमता होती है। आप दस्तावेजों को टाइप करने, ईमेल भेजने, गेम खेलने और वेब ब्राउज़ करने के लिए कंप्यूटर का उपयोग कर सकते हैं। आप स्प्रैडशीट्स, प्रस्तुतियों और यहां तक ​​कि वीडियो बनाने के लिए इसका उपयोग भी कर सकते हैं।

“कंप्यूटर User द्वारा Input किये गए डाटा को Process करके परिणाम को Output के रूप में प्रदान करता हैं ”
“The Data Input Process by Computer User by Output results are provided as “

कम्प्यूटर का जनक कौन है 

कम्प्यूटर का जनक चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage) को कहा जाता है,  चार्ल्स बैबेज जन्म लंदन में हुआ था वहां की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है तो अंग्रेजी से ही कोई शब्द क्यों नहीं लिया गया इसकी वजह यह है कि जो अंग्रेजी भाषा है उसके  तकनीकी शब्द खासतौर पर प्राचीन ग्रीक भाषा और लैटिन भाषा पर आधारित है इसलिए कंप्यूटर शब्द के लिए यानी एक ऐसी मशीन के लिए जो गणना करती है उसके लिए लैटिन भाषा के शब्द कंप्यूट (Comput)  को लिया गया

कंप्यूटर का फुल फॉर्म

  • C – COMMON आम तौर पर
  • O – (OPERATOR) संचालित
  • M – (MACHINE) मशीन
  • P- (PARTICULAR) विशेष रूप से
  • U- (USE) प्रयुक्त
  • T – (TECHNICAL) तकनीकी
  • E – (EDUCATION) शैक्षणिक
  • R – (RESEARCH) अनुसंधान

कंप्यूटर के भागों का नाम – Computer parts Name

  • प्रोसेसर – Micro Processor.
  • मदर बोर्ड – Mother Board.
  • मेमोरी – Memory.
  • हार्ड डिस्क – Hard Disk Drive.
  • मॉडेम – Modem.
  • साउंड कार्ड – Sound Card.
  • मॉनिटर – Monitor.
  • की-बोर्ड माउस – Keyboard/Mouse.

Computer मूलत दो भागों में बॅटा होता है-

  • सॉफ्टवेयर
  • हार्डवेयर

Hardware vs. software

विभिन्न प्रकार के कंप्यूटरों के बारे में बात करने से पहले हम दो चीजों के बारे में जान लेते हैं जो सभी कंप्यूटरों में आम हैं: हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर।

Hardware

हार्डवेयर आपके कंप्यूटर का कोई भी हिस्सा होता है जिसमें भौतिक संरचना शामिल है, जैसे कीबोर्ड या माउस। इसमें कंप्यूटर के सभी आंतरिक भाग भी शामिल हैं, जिन्हें आप नीचे दी गई छवि में देख सकते हैं।

Software                                       

सॉफ्टवेयर निर्देशों का कोई भी सेट होता है जो हार्डवेयर को बताता है कि क्या करना है और इसे कैसे करना है। सॉफ्टवेयर के उदाहरणों में वेब ब्राउज़र, गेम्स और वर्ड प्रोसेसर आदि शामिल हैं।  आपके कंप्यूटर पर जो कुछ भी आप करते हैं वह हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों के द्वारा किया जाता हैं| उदाहरण के लिए, अभी आप इस टेक्स्ट को वेब ब्राउज़र (सॉफ़्टवेयर) में देख रहे हैं यह एक सॉफ्टवेयर हैं और पेज पर क्लिक करने के लिए अपने माउस (हार्डवेयर) का उपयोग कर रहे हैं तो माउस एक हार्डवेयर हैं|

कंप्यूटर का विकास और इतिहास

कंप्यूटर का इतिहास (History of Computer)

आज हम जानेंगे की कंप्यूटर का इतिहास (History of Computer) आज से लगभग 300 वर्ष पूराना है, मूल रूप से कंप्यूटर का विकास गणितिय गणनाओं को बड़ी संख्या में करने के लिए किया गया था। कंप्यूटर का इतिहास यही व्यख्त करता है की काफी कठोर प्रयास के बाद ही कंप्यूटर का विकाश संभव हो सका हैं। इस प्रक्रिया में विभिन्न प्रणालियों को जन्म दिया जैसे बेबीलोनियन प्रणालीयूनानी प्रणालीरोमन प्रणाली और भारतीय प्रणाली, मगर इनमें से भारतीय प्रणाली को स्वीकार कर लिया गया है।

भारत के प्राचीन विख्यात खगोल शास्त्री और गणितज्ञ आर्यभठ्ठ के द्वारा दशमलव प्रणाली (Decimal System) का विकसित किया था। यह 0-9 संख्याकरण की आधुनिक दशमलव प्रणाली का आधार है तथा बाइनरी नंबर प्रणाली (0,1) का सर्वप्रथम ज्ञात विवरण प्रस्तुत किया गया | इन दो अंको (0 और 1) का ही प्रयोग प्रथम कम्प्यूटर की संरचना के लिए मुख्य रूप से किया गया था।

कंप्यूटर शब्द का इस्तेमाल कंप्यूटर के निर्माण से बहुत पहले से ही होता आ रहा है पहले के समय में यांत्रिक उपकरणों को संचालित करने वाले विशेषज्ञ व्यक्ति को ही “कंप्यूटर” नाम से जाना था| समय के साथ-साथ इन यंत्रो में अनेक प्रकार के बदलाव तथा सुधार किये गए। तब  जाकर आधुनिक कंप्यूटर (Modern Computer) का निर्माण संभव हो सका जिससे हम “कंप्यूटर के इतिहास” के रूप में जानते है।

कंप्यूटर का इतिहास तथा अबेकस का आविष्कार

Abacus

कंप्यूटर का इतिहास (History of Computer) को देखे तो हमे ये पता चलेगा की मानव के लिए गणितीय गणना करना शुरु से ही कठिन रहा है तब हमे एक ऐसे यंत्र की आवश्यकता महसूस होने लगी जिसकी सहायता से हम आसानी से अपनी गणितीय गणना कर सके। एबाकस (ABACUS) पहली मैकेनिकल (Mechanical) गणना करने वाली मशीन थी।

जिसकी सहायता से हम बड़ी संख्या और आंकड़े की गणना किया जा सकता था और अंकगणित इत्यादि कर सकते थे। यह लगभग 5000 साल पहले चीन में आविष्कार हुआ था। इसमें संख्याओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए मोतियों के साथ कई छड़ हैं।एबाकस पर गणना इन मोतियों को छड़ से फिसलने के द्वारा किया जाता है। परन्तु अबेकस के द्वारा गुणन और विभाजन का कार्य नहीं किया जा सकता था। ये भी कंप्यूटर के विकास क्रम का एक भाग है। इस मशीन के आविष्कार ने कंप्यूटर के विकास का आगाज कर दिया था।

कंप्यूटर का इतिहास तथा नेपियर बोनस का विकास

1616 में, सर जॉन नेपियर ने एक गणना उपकरण बनाया और इसे नैपियर बोन्स (Napier’s Bones) कहा गया। इसका उपयोग से जोड़ (Addition), घटाव (Subtraction), गुणा (Multiplication) और भाग (Division) किया जाता था। यह डिवाइस आयताकार छड़ का एक सेट से बना है। कंप्यूटर के विकास में सर जॉन नेपियर का नेपियर बोन्स का प्रभावाशाली भूमिका था।

जैसा की हम जानते है की सर जॉन नेपियर (John Napier) एक स्कॉटिश गणितज्ञ थे जो लोगारिथ्म्स (Logarithms) के अपने आविष्कार के लिए प्रसिद्ध हुये थे। उनके लॉगस (Logs) के उपयोग से किसी भी गुणा समस्या को कम समय में हल करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उनकी “नेपियर बोन्स” आयताकार छड़ का एक सेट से बना जिशमे ग्यारह छड़ की सेट होती हैं और छड़ को “बोन्स” इसलिये कहा जाता था क्योंकि वे हाथीदांत (Ivory) से बने थे।

कंप्यूटर का इतिहास तथा पास्‍कलाइन का खोज

Pascaline

एबाकस तथा नेपियर बोन्स के निर्माण के बाद पास्‍कलाइन का आविष्कार हुआ। सन् 1642 में ब्लेज़ पास्कल ने पास्‍कलाइन का आविष्कार किया, जो एक यांत्रिक मशीन था। इसमें आठ चलने वाले पहियों के साथ एक आयताकार बॉक्स शामिल था। यह 10, 100 और 1000 के साथ जोड़ने, घटाने में सक्षम था। यह अबेकस से अधिक गति से गणना करता था, तथा ये पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर था।

जैसा की हम जानते है की ब्लेज़ पास्कल एक फ्रांसीसी गणितज्ञ थे और पहले आधुनिक वैज्ञानिकों में से एक थे जिन्होंने कैलकुलेटर विकसित किया और इशका निर्माण किया था। उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में एक मशीन विकसित की जो संख्याओं को जोड़ना और घटाने में सक्षम थी। मशीन को पहियों की श्रृंखला के डायल द्वारा संचालित किया जाता था। ये गणितीय गणना कर सकता था और श्रम को भी बचा सकता था।

कंप्यूटर का विकास तथा डिफ्रेन्सियल और एनालिटीकल इंजन का अविष्कार

portion Charles Babbage Analytical Engine

सन् 1822 में चार्ल्स बेबेज ने पास्कलिन से प्रेरणा लेकर पहला यांत्रिक कंप्यूटर का आविष्कार किया था, इसे डिफ्रेन्सियल इंजन कहा जाता था। उन्होंने विचित्र-विचित्र मशीने जैसे “डिफरेंशिअल इंजन” तथा “एनालिटीकल इंजन” बनाया जो सही तरीके से गणना कर सकते थे।

चार्ल्स बैबेज एक ब्रिटिश गणितज्ञ, जिसे कंप्यूटर के पिता के रूप में माना जाता है, उन्होंने एनालिटीकल इंजन के रूप में जाना जाने वाला पहला सामान्य कंप्यूटर का आविष्कार किया तथा इसके आधार पे ही आज के कंप्यूटर बनाये जा रहे हैं इसलिए चार्ल्स बैवेज को कंप्यूटर का जनक कहा जाता है। उन्होंने 1937 में स्वचालित कंप्यूटर की परिकल्पना की थी जिसे वे धन की कमी के कारण पुरा नहीं कर सके थे।

मगर हथर्न होलेरीथ ने उससे पूरा किया जिसमे पंचकार्ड की इश्तेमाल से कृत्रिम स्मृति तथा प्रोग्राम के अनुरूप गणना करने की क्षमता थी। इसीलिए “चार्ल्स बैबेज” को “आधुनिक कंप्यूटर का जनक” कहा जाता है|

जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (Generations of Computer)

कम्प्यूटर की पीढियाँ (Generation of Computer)

कंप्यूटर का विकास 16 वीं शताब्दी से शुरू हो गया था तथा आज का आधुनिक कंप्यूटर इसका परिणाम है। हालांकि, कंप्यूटर के विकास में तेजी से बदलाव आया है। प्रत्येक पीढ़ी के बाद, कंप्यूटर के आकार-प्रकार, कार्यप्रणाली और कार्यशीलता में बहुत सुधार हुआ है। वर्तमान के कंप्यूटर काफी आधुनिक और विकसित है। इस क्रम-विकास की अवधि के दौरान, कंप्यूटर में काफी परिवर्तन आए हैं। जिसने कंप्यूटरों की नई पीढीयों को जन्म दिया है और विभिन्न प्रकार के कंप्यूटरों का आविष्कार हुआ है। जिसे हम जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (Generation of Computer in Hindi) के नाम से जानते है और इसे कम्प्यूटर की विभिन्न पीढ़ियों में विभाजित किया गया है।

  • पहली पीढ़ी के कंप्यूटर (1940 – 1956)
  • दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर (1956 – 1963)
  • तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटर (1964 – 1971)
  • चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर (1971 – 1980)
  • पांचवीं पीढ़ी के कंप्यूटर (वर्तमान और भविष्य)

1. पहली पीढ़ी के कंप्यूटर (1940 – 1956)

First Generation Computer

पहले पीढ़ी के कंप्यूटर में वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tube) का इस्तेमाल किया गया था। वैक्यूम ट्यूब एक नाजुक कांच का यंत्र था, जिसे गैस को निकाल कर वैक्यूम बनाया गया था। वैक्यूम ट्यूबों में इलेक्ट्रॉन प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए इलेक्ट्रोड होते हैं और प्रारंभिक कंप्यूटर में इसे एक स्विच (Switch) या एम्पलीफायर (Amplifier) के रूप में उपयोग किया जाता था। यह इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को नियंत्रित और बढ़ा भी सकता था। ये वैक्यूम ट्यूबों का उपयोग गणनाओं के साथ-साथ भंडारण और नियंत्रण के लिए किया जाता था।

पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर (Electronic Computer), “ENIAC” (इलेक्ट्रौनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कंप्यूटर) था। इसका आविष्कार जे. प्रेसपर एकर्ट (J. Presper Eckert) और जॉन विलियम मौचली (John William Mauchly) ने पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय (Pennsylvania University) में किया था।

ENIAC लगभग 30 से 50 फीट लंबा था, जिसका वजन 30 टन था, इसके लिए 18,000 वैक्यूम ट्यूब, 70,000 रजिस्टर, 10,000 कैपेसिटर और 150,000 वाट बिजली की आवश्यकता होती थी।

पहले पीढ़ी के कंप्यूटर आकार में बहुत बड़े और भारी होते थे, जिनको रखने के लिए बड़े कमरे की आवश्यकता होती थी और वे बड़ी मात्रा में गर्मी का उत्सर्जन करते थे, इसलिए कंप्यूटर के उचित काम के लिए एयर कंडीशनर (Air Conditioner) की आवश्यक होती थीं। हाइड्रोजन बम के निर्माण हेतु, कठिन गणना करने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध में “ENIAC” का पहली बार उपयोग किया गया था।

बाद में, इसका उपयोग मौसम का पूर्वानुमान लगाने में, अंतरिक्ष अनुसंधान के गणितीय समस्याओं को हल करने और अन्य वैज्ञानिक कार्यों के लिए किया जाता था, लेकिन इसकी बहुत धीमी गति के कारण, इसका उपयोग जल्दी ही बंद कर दिया गया।

ENIAC के बाद, जॉन प्रेसपर एकर्ट (John Presper Eckert) और जॉन विलियम मौचली (John William Mauchly) ने वर्ष 1946 में “EDVAC” (इलेक्ट्रॉनिक डिस्क्रीट वेरिएबल आटोमेटिक कंप्यूटर) का आविष्कार किया था।

EDVAC में प्रोग्राम्स के साथ-साथ चल रहे डेटा भी मेमोरी में संग्रहीत होते थे तथा इसमें डेटा और निर्देशों दोनों बहुत तेज़ प्रोसेस हो रहे थे। सन 1952 में एकर्ट और मौचली ने पहला वाणिज्यिक कंप्यूटर “UNIVAC” (यूनिवर्सल ऑटोमैटिक कम्प्यूटर) भी विकसित किया था।

इस पीढ़ी के कम्प्यूटर में इंटरनल मेमोरी के रुप में मेग्नेटिक ड्रम का उपयोग किया जाता था। इस जनरेशन में प्रोग्रामिंग (Programming) “मशीन” और “असेम्बली” लैंग्वेज (Machine and Assembly Language) में की जाती थी, मशीन लेंग्वेज केवल 0 और 1 पर आधारित होती हैं। फर्स्ट जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (First Generation of Computer) की समय अवधि 1940-1956 थी, जो “वैक्यूम ट्यूब” (Vacuum Tube) टेक्नोलॉजी पर आधारित थी।

2. दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर

(1956 – 1963)

transistors

दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में, वैक्यूम ट्यूब को “ट्रांजिस्टर” (Transistor) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था। इसका विकास विलियम शॉक्ले (William Shockley) ने 1947 में किया था। कंप्यूटर आकार में छोटे, तेज और सस्ते हो गए थे। वे पहले की तुलना में कम ऊर्जा का इस्तेमाल करते थे। इन कंप्यूटरों पर प्रोग्रामिंग करना संभव था कंप्यूटर की इस पीढ़ी का उपयोग मुख्य रूप से न्यूक्लियर पावर प्लांट (Nuclear Power Plant) में किया गया था। इसमें मेमोरी के तौर पर चुम्बकीय टेप (Magnetic Tape) का प्रयोग किया जाता था। सेकंड जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (Second Generation of Computer in Hindi) की समय अवधि 1956-1963 थी, जो “ट्रांजिस्टर” (Transistor) टेक्नोलॉजी पर आधारित थी।

3. तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटर

(1964 – 1971)

तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में, एकीकृत परिपथ (Integrated Circuit) या I.C. का इस्तेमाल किया गया था। IC (इंटीग्रेटेड सर्किट) एक जटिल चिप होता है, जिसमें बहुत सारे ट्रांजिस्टर होते हैं। आईसी (IC) का आविष्कार टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स कंपनी (Texas Instruments Company) के एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर जैक किल्बी (Jack Kilby) द्वारा 12 सितंबर 1958 में किया गया था। ICL 2903, ICL 1900, UNIVAC 1108 और System 1360 इस पीढ़ी के मुख्य कंप्यूटर थे।

Integrated circuit

IC (इंटीग्रेटेड सर्किट) के अंदर बहुत सारे छोटे-छोटे ट्रांजिस्टर लगाए जाते हैं, उन्हें सिलिकॉन चिप्स पर लगाया जाता है, जिन्हें अर्धचालक (Semiconductors) कहा जाता है। इससे कंप्यूटर की गति बढ़ जाती है क्योंकि ट्रांजिस्टर (Transistor), रजिस्टर (Register) और कैपेसिटर (Capacitor) तीनों ही एक आईसी (IC) में समाहित हो जाते हैं। जिससे कम्प्यूटर का आकार बहुत छोटा हो जाता है और इसकी काम करने की गति भी बढ़ जाती है और इसमें बिजली की खपत भी कम होती है।

एक ही समय में इन कंप्यूटरों पर कई अलग-अलग कार्य को किया जा सकता हैं। इस समय तक कंप्यूटर आम आदमी की पहुंच के भीतर आ गया था। स्केल इंटीग्रेटेड सर्किट (Scale Integrated Circuit) के कारण इन कंम्यूटरों की गति माइक्रो सेकंड (Microsecond) से नेनो सेकंड (Nanosecond) तक हो चुकी थी।

इन कंप्यूटरो में ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग किया जाने लगा था तथा नये नये हाई लेवल लैंग्वेजेज का विकास हुआ था। जैसे BASIC (Beginner’s All Purpose Symbolic Instruction Code) IC (इंटीग्रेटेड सर्किट) के कारण कंप्यूटर अधिक तेज हो गया था तथा इसके आंतरिक कार्य स्वचालित हो गये थे। थर्ड जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (Third Generation of Computer in Hindi) की समय अवधि 1964-1971 थी, जो “इंटीग्रेटेड सर्किट” (Integrated Circuit) टेक्नोलॉजी पर आधारित थी।

4. चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर (1971 – 1980)

microprocessor

चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर में, माइक्रोप्रोसेसर (Microprocessor) का इस्तेमाल किया गया था। ये कंप्यूटर वर्तमान में उपयोग होते हैं और आगे विकसित किए जा रहे हैं। इस जनरेशन में माइक्रोप्रोसेसर चिप्स (Microprocessor Chips) विकसित किए गए थे। माइक्रोप्रोसेसर का आविष्कार 1971 में Marcian E Huff द्वारा किया गया था।

कंप्यूटर संचालन के लिए 0 और 1 को कोडित किया गया था। ये बाइनरी संख्या के रूप में जाना जाता है। इस पीढ़ी के कुछ कंप्यूटर बहुत छोटे थे, वे आपकी हाथ की हथेली में फिट हो सकते हैं। इन कंप्यूटरों को छोटे से छोटा, अधिक तेज और सस्ते बनाया गया था और व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। इस चरण के दौरान माउस और अन्य पेरिफेरल डिवाइस, जैसे जॉयस्टिक इत्यादि को विकसित किया गया था। एक दूसरे के साथ जानकारी साझा करने के लिए एक नेटवर्क में कंप्यूटरों को एक साथ जोड़ा जा सकता था, इसने इंटरनेट के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

माइक्रोप्रोसेसर की यह तकनीक जिसे Large Scale Integrated Circuit का नाम दिया गया था, एक छोटी सी चिप में लाखो ट्रांजिस्टरों से निर्मित इस चिप (Chip) को ही माइक्रोप्रोसेसर (Microprocessor) नाम दिया गया था। पहला माइक्रो कम्प्यूटर MITS नाम की प्रसिद्ध कंपनी ने बनाया था। आज दुनिया में दो बड़ी माइक्रोप्रोसेसर बनाने वाली कंपनिया Intel और AMD है। उच्च गति वाले नेटवर्क का विकास हुआ जिन्हें आप लैन (Local Area Network) और वैन (Wide Area Network) के नाम से जानते हैं।

ऑपरेटिंग सिस्टम MS DOS का पहली बार इस्तेमाल इसी पीढ़ी में हुआ था। इसके साथ ही कुछ समय बाद माइक्रोसॉफ्ट विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम (Microsoft Windows Operating System) भी कंप्यूटरों में आने लगा था। जिसकी वजह से मल्टीमीडिया (Multimedia) का प्रचलन प्रारम्भ हुआ था। इसी समय C प्रोग्रामिंग भाषा (C Programming Language) का विकास हुआ था।

जिससे प्रोग्रामिंग (Programming) करना सरल हो गया था। कंप्यूटर के क्षेत्र में सबसे बड़ी क्रांति इस पीढ़ी को माना जाता है। कंप्यूटर का उपयोग अब हम सभी पर्सनल कंप्यूटर (Personal Computer) के रूप में भी करने लगे है। फोर्थ जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (Fourth Generation of Computer in Hindi) की समय अवधि 1971-1980 थी, जो “VLSI माइक्रोप्रोसेसर” (VLSI Microprocessor) टेक्नोलॉजी पर आधारित थी।

5. पांचवीं पीढ़ी के कंप्यूटर

(1980 और भविष्य
Fifth Generation Computer

कंप्यूटर की पांचवीं पीढ़ी जिस पर अभी काम चल रहा है पर यह अभी तक यह स्पष्ट नहीं है की पाचवी पीढ़ी किस दिशा में जाएगी। पांचवीं पीढ़ी के कंप्यूटर ULSI (Ultra Large Scale Integration) तकनीक पर आधारित है। इस जनरेशन के कंप्यूटर में कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence ) क्षमता विकसित की जा रही है ये उसी के अनुसार कार्य करेंगे।

इस पीढ़ी के कम्प्यूटर में स्वयं सोचने की क्षमता पैदा की जा रही है। कम्प्यूटर को हर क्षेत्र में कार्य करने योग्य बनाया जा रहा है और कुछ हद तक सफलता भी मिल चुकी है उदाहरण के लिये विंडोज कोर्टाना (Windows Cortana), गूगल असिस्टेंट (Google Assistant), एप्पल सीरी  (Apple Siri) आदि को आप देख ही रहे हैं।

इसमें हाई लेविल प्रोग्रामिंग भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। GUI (Graphical User Interface) की सहायता से इसे अधिक सरल बनाया जा रहा है। ये कंप्यूटर किसी समस्या के हल करने के लिए इन्टरनेट का इस्तेमाल करते है क्योंकि ये नेटवर्क के माध्यम से जुड़े होते है। कुछ कंप्यूटर्स को तो मनुष्य की तरह व्यव्हार करने तथा सभी काम खुद से करने के लिए डिजाईन किया जा रहे है जिन्हें रोबोट (Robot) कहाँ जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित रोबोट सोफिया (Sophia) है।

आपने Marvel Iron Man (2008), फ़िल्म देखी ही होगी, टोनी स्टार्क (Robert Downey Jr.) के J.A.R.V.I.S. और F.R.I.D.A.Y. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम के बारे में तो निश्चित रूप से सुना ही होगा। अगर नही सुना तो कोई बात नही आपको मैं बता देता हूं, J.A.R.V.I.S और F.R.I.D.A.Y एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम (Artificial Intelligence System) है जो आयरन मैन से बात कर सकता है, यह एप्पल सिरी जैसा ही है लेकिन उससे 200000 गुना अधिक उन्नत है। यह बहुत से काम कर सकता है। जैसे इंसानों की तरह बात करना, एनालिसिस करना, सिमुलेशन करना, कॉपी करना, अपलोड करना, हैकिंग करना और साथ ही आयरन मैन के सूट और डिफेंस सिस्टम का उपयोग करना आदि शामिल है।

हालांकि ये काल्पनिक है, ऐसा सुनने को मिल रहा की 2050 तक हमे ऐसे ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी देखने को मिलेगी। इसपे अभी काम चल रहा है। फिफ्थ जनरेशन ऑफ कंप्यूटर (Fifth Generation of Computer) की समय अवधि 1980-भविष्य है, जो “ULSI माइक्रोप्रोसेसर” (ULSI Microprocessor) टेक्नोलॉजी पर आधारित थी।

कंप्यूटर के प्रकार क्या है? (Types of Computer)

कंप्यूटर आधुनिक प्रौद्योगिकी के चमत्कारों में से एक हैं, आज की दुनिया में कंप्यूटर बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। आज मै आपको बताऊंगा की कंप्यूटर के प्रकार (Types of Computer in Hindi) कितने है तथा इनका विवरण सरल शब्दों में देने की कोशिस करूँगा। जैसा की हम जानते है की कंप्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) मशीन है। जो की डेटा (Data) प्राप्त करता है, निर्देशों (Instructions) के अनुसार डेटा को प्रोसेस (Process) करता है, डेटा संग्रहित (Stores) करता है और वांछित आउटपुट (Output) हमे देता है। कम्प्यूटर के प्रकार उनकी उपयोग (Use), गति (Speed) और आकार (Size) पर आधारित है। इन सभी प्रश्नों का जबाब बहुत ही आसान शब्दों में दूंगा।

कंप्यूटर के कितने प्रकार होते हैं? (Types of Computer)

कंप्यूटर मानव जाति के उज्ज्वल रचनाओं में से एक है। कंप्यूटर बहुत सारे कार्यों को एक समय पर कर सकते हैं कुछ कंप्यूटर इतने शक्तिशाली हैं कि सैकड़ों या हजारों उपयोगकर्ता केवल एक ही समय पर उपयोग कर सकते हैं। कंप्यूटर के प्रकार विभिन्न क्षमताओं और विभिन्न आकारों के है। कंप्यूटर का वर्गीकरण, उपयोग, गति और कंप्यूटर के आकार पर आधारित है।

  • अनुप्रयोग के आधारपर (According To Application)
  1. एनालॉग कम्प्यूटर : एनालॉग कम्प्यूटर (Analog Computer) वैसे कंप्यूटर होते है जिनका इस्तेमाल भौतिक मात्राओ को जैसे – तापमान, दाब, गति, वोल्टेज, प्रतिरोध इत्यादि का मापन करते है न कि गणना करते है। इनका प्रयोग अनुसंधान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में किया जाता है।
  2. डिजिटल कम्प्यूटर : डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer) वैसे कंप्यूटर होते है जिनका इस्तेमाल सभी कार्यो को डिजिट के रूप में करते है जिसे बाइनरी नंबर सिस्टम कहते है । यह 0 और 1 पर कार्य करते है, हम विभिन्न अनुप्रयोगों जैसे शिक्षा, बैंकिंग, व्यापार, मनोरंजन इत्यादि मै डिजिटल कंप्यूटर का इस्तेमाल करते है और आजकल ये काफी प्रसिद्ध है।
  3. हाईब्रिड कम्प्यूटर : हाईब्रिड कम्प्यूटर (Hybrid Computer) वैसे कंप्यूटर होते है जिनमे हाइब्रिड और डिजिटल दोनों कंप्यूटर के गुण होते है। उदाहरण के लिए हाईब्रिड कम्प्यूटर का इस्तेमाल चिकित्सा मे अधिक होता है, जैसे की किसी रोगी का रक्तचाप, धड़कन, इत्यादि मापने के लिए एनालॉग यंत्र का इस्तेमाल करने की जगह हम हाईब्रिड कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर एनालॉग डाटा को पहले डिजिटल डाटा के रूप में बदलते है फिर परिणाम डिजिटल रूप में स्क्रीन पर प्रदर्शित होता है।
  • उद्देश्य के आधार पर (According to Purpose)
  1. माइक्रो कंप्यूटर (Micro Computer) : माइक्रो कंप्यूटर को व्यक्तिगत कंप्यूटर (Personal Computer) के रूप में भी जाना जाता है, यह एक डिजिटल कंप्यूटर है जो माइक्रोप्रोसेसर पर काम करता है। माइक्रो कंप्यूटर व्यक्तिगत उपयोगकर्ता के लिए डिज़ाइन की जाने वाली व्यक्तिगत कंप्यूटर हैं जो वर्ड प्रोसेसिंग (Word Processing), डेस्कटॉप प्रकाशन (Desktop Publishing)और अकाउंटिंग (Accounting) जैसे कार्य करता है। मनोरंजन प्रयोजनों के साथ-साथ गेम (Game) खेलना, संगीत सुनना (Listening Music), इन्टरनेट का प्रयोग (Internet Browsing),और फिल्में देखने (Movie Watching) के लिए माइक्रो कंप्यूटर व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं, ये कंप्यूटर छोटे आकार (Small Size) का कम लागत (Low Cost) और पोर्टेबल (Portable) होता हैं।
  2. मिनी कंप्यूटर (Mini Computer) : मिनी कंप्यूटर एक मध्य आकार के बहु प्रसंस्करण (Multiprocessing) और बहु उपयोगकर्ता (Multi-User) कंप्यूटर है। बहुप्रोसेसिंग (Multiprocessing) एक निश्चित समय पर कई प्रोग्राम या प्रक्रिया चलाने की प्रक्रिया है। मिनी कंप्यूटर एक मध्यम श्रेणी का कंप्यूटर है। इसे मध्य श्रेणी सर्वर (Server) के रूप में भी जाना जाता है माइक्रो कंप्यूटरों और मेनफ्रेम के बीच की श्रेणी का कंप्यूटर है। यह व्यापार, संगठनों में खातों के रखरखाव और वित्तीय डेटा और अनुप्रयोगों के लिए उपयोग किया जाता है। मिनीकंप्यूटर अधिक शक्तिशाली हैं और यह माइक्रो कंप्यूटर के साथ अनुकूल (Compatible) है।
  3. मेनफ़्रेम कंप्यूटर (Mainframe Computer) : मेनफ्रेम विशाल कंप्यूटर होते है, इतने बड़े आकर के होते है, जो की पूरे कमरे या फर्श छेंक लेते है। मेनफ्रेम बड़ी कंपनियों में केंद्रीकृत सेवा देने के रूप में उपयोग किया जाता है। वे केंद्रीकृत कंप्यूटिंग की सेवा के उद्देश्य से डिजाइन किए जाते है। कंप्यूटिंग के क्षेत्र में विकास के साथ, मेनफ्रेम का आकार कम हो गया है और प्रसंस्करण क्षमता में वृद्धि हुई है। वे अब कंप्यूटिंग नेटवर्क में वितरित उपयोगकर्ताओं और छोटे सर्वरों को सेवा देते हैं.वे भी एंटरप्राइज़ सर्वर के रूप में जाने जाते हैं मेनफ्रेम बहुत बड़े और महंगे कंप्यूटर है। हजारों लोग एक समय में मेनफ्रेम का उपयोग कर सकते हैं यह हर दिन लाखों लेनदेन की प्रक्रिया कर सकता है मेनफ्रेम व्यापक रूप से बड़ी कंपनियों में दुनिया भर में उपयोग किया जाता है सरकारी संगठनों में मेनफ्रेम व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है आईबीएम सिस्टम z10 मेनफ्रेम कंप्यूटर का एक उदाहरण है।
  4. सुपर कंप्यूटर (Super Computer) : सुपर कंप्यूटर ऐसे कंप्यूटर होते है जो की बहुत तेज और आकर मे बड़े कम्प्यूटर होते है। इनका इस्तेमाल सरकारी या बड़े संगठनों में मौसम विज्ञान की जानकारी, उपग्रह,अंतरिक्ष यात्रा, सैन्य और वैज्ञानिक अनुसंधान मे इस्तेमाल किये जाते है। इनमे एक से अधिक C.P.U. होते है, जिससे इनकी गति सबसे अधिक तेज़ व अधिक क्षमता वाले कंप्यूटर होते हैं| ये सुपर कंप्यूटर सबसे महँगे और आकार में बहुत बड़े होते हैं। भारत का पहेला सुपर कंप्यूटर परम 8000 (PARAM 8000) है, जिसे 1 जुलाई, 1991 में उन्नत कंप्यूटिंग के विकास के लिए बनाया गया तथा इश्का शुभारंभ किया गया था, यह सुपर कंप्यूटर C-DAC द्वारा बनाई गई थी। अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें।

कंप्यूटर की कार्य प्रणाली (Computer Functions)

             जैसा की हम जानते है कंप्यूटर चार प्रकार के उपकरणों इनपुट डिवाइस (Input Device), आउटपुट डिवाइस (Output Device), प्रोसेसिंग डिवाइस (Processing Device) और स्टोरेज डिवाइस (Storage Device) से मिलकर बना है। चलिए, कंप्यूटर की कार्य प्रणाली (Computer Functions in Hindi) को विस्तार से समझते हैं कि यह डेटा को इनपुट के रूप में लेता है निर्देशों के हिसाब से उसे प्रोसेस करता, और अंत में परिणाम को आउटपुट के रूप में देता है। कम्प्यूटर को कार्य करने के लिए सॉफ्टवेयर (Software) और हार्डवेयर (Hardware) की आवश्यकता होती है।

कंप्यूटर का सीपीयू विभिन्न प्रकार के हार्डवेयर से जुड़ा होता है, सॉफ़्टवेयर हार्डवेयर और कंप्यूटर के बीच के माध्यम का काम करता है जिसे हम सिस्टम सॉफ्टवेयर (System Software), अर्थात ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System) कहते है । कंप्यूटर की कार्य प्रणाली की प्रक्रिया एक चरणबद्ध तरीके से होती है| कंप्यूटर आम तौर पर इन तीन चरणों का पालन करता है वे निम्नलिखित हैं:-

इनपुट (Input) —-> प्रोसेसिंग (Processing) —-> आउटपुट (Output)

 

इनपुट क्या है? (What is Input)

यह कंप्यूटर सिस्टम में डेटा और निर्देशों को दर्ज करने की प्रक्रिया है। क्योंकि कंप्यूटर किसी अन्य मशीन की तरह एक इलेक्ट्रॉनिक मशीन है जो डेटा इनपुट के रूप में लेता है और निर्देशों के हिसाब से डेटा की प्रोसेसिंग करता है, इनपुट यूनिट उपयोगकर्ता से डेटा और अनुदेशों को प्रोसेसिंग के लिए एक संगठित तरीके से लेता है। इनपुट कीबोर्ड, माउस, स्कैनर, डिजिटल कैमरा और माइक्रोफ़ोन आदि जैसे इनपुट डिवाइस (Input Device) द्वारा किया जाता है।

स्टोरेज क्या है? (What is Storage)

इस के द्वारा हम आवश्यक डेटा और निर्देशों का संचयन करते है ताकि वह डाटा भविष्य में उपलब्ध हो सके। डेटा और प्रोग्राम्स स्थायी भंडारण उपकरणों पर संग्रहीत होते हैं। विशेष रूप से हार्ड डिस्क पर, अन्य स्थायी भंडारण मीडिया में सीडी, डीवीडी, ब्लू – रे डिस्क, फ्लॉपी डिस्क, फ्लैश ड्राइव, एसएसडी और यूएसबी मेमोरी कार्ड इत्यादि हैं।

प्रोसेसिंग क्या है? (What is Processing)

कंप्यूटर के प्रोसेसर (Processor) के द्वारा इनपुट (Data and Instruction) डाटा और आंकड़ों को अंकगणित (Arithmetic) और तार्किक (logical) निर्देशानुसार कार्यों को विश्लेषण करने की प्रक्रिया है। प्रोसेसिंग CPU-सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट द्वारा किया जाता है। सीपीयू स्टोरेज यूनिट से डेटा और निर्देश लेता है और दिए गए निर्देशों के आधार पर सभी प्रकार की गणना करता है।

तब यह डाटा वापस भंडारण इकाई में भेजा जाता जहा अंकगणितीय और तार्किक इकाइयों द्वारा उपलब्ध डाटा का विश्लेषण होता है। RAM अस्थायी रूप से डेटा और निर्देशो को संग्रहीत करता है।

आउटपुट क्या है? (What is Output)

डेटा प्रोसेसिंग होने के बाद उपलब्ध जानकारी को आउटपुट डिवाइस की सहायता से प्रस्तुत करने की प्रक्रिया है, उदाहरण के लिए, उपयोगकर्ता के लिए मुद्रित (Printed) रिपोर्टें को आउटपुट डिवाइस स्क्रीन (मॉनिटर) या प्रिंटर पर प्रदर्शित करते हैं और अन्य कंप्यूटरों को जानकारी भेजते हैं।

वे संदेशों के बारे में भी प्रदर्शित करते हैं उदाहरण के लिए, हम जो ईमेल भेजते है या हम जो मेसेज या चैटिंग करते है तो हमे प्राप्त सूचनाये या संदेश भी आउटपुट डिवाइस स्क्रीन (मॉनिटर) पर ही प्रदर्शित होते है, हमे जो कंप्यूटर इत्यादि में जो त्रुटिया (Errors) प्राप्त होती है वह भी मॉनिटर पर ही प्रदर्शित होते है। हमे आउटपुट, आउटपुट डिवाइस के द्वारा मिलता है जैसे मॉनिटर (Monitor), प्रिंटर (Printer), और स्पीकर (Speaker) इत्यादि।

 

  • शिक्षा में कंप्यूटर के लाभ एवं उपयोग

शिक्षा में कंप्यूटर के अनेक प्रकार के लाभ होते हैं वर्तमान में शिक्षा कार्य को रोचक एवं प्रभावशाली बनाने में कंप्यूटर का बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है।

कंप्यूटर वाले इंटरनेट के चलते ही आज वाला घर बैठे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं  कंप्यूटर वह इंटरनेट के चलते हैं आज बालक घर बैठे शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं| कंप्यूटर इंटरनेट टेक्नोलॉजी के बढ़ जाने के कारण वर्तमान में स्कूल एवं कॉलेज आसानी से कंप्यूटर उपयोग होते हैं तथा इसके चलते ही स्मार्ट क्लास आयोजित किया जाता है|

 शिक्षा अधिगम में कंप्यूटर

  • शिक्षण की न्यूनतापूर्ति करना कंप्यूटर का प्रयोग कक्षा कक्ष शिक्षण की न्यूनता पूर्ति करने के लिए किया जाता है इसका प्रयोग धारनाओ को समझने में छात्रों की सहायता करने के लिए किया जाता है|
  • छात्रों का वर्गीकरण छात्रों का उसकी योग्यताओं अभिवृत्ति ओं रुझानों रिचार्ज और उसकी उपलब्धता के अनुसार वर्गीकरण करने के प्रयोजन के लिए कंप्यूटर का उपयोग किया जाता है|
  • समय सारणी तैयार करना कंप्यूटर का उपयोग समय सारणी तैयार करने के लिए किया जाता है हाथों में समय सारणी तैयार करने में काफी समय लगता है यदि समय सारणी कंप्यूटर पर तैयार की जाती है तो समय की काफी बचत होती है और आसानी से परिवर्तन किया जा सकता है|
  • अधिगम संसाधनों का आवंटन छात्रों को अलग-अलग आवश्यकता व मूर्तियों के अनुसार अधिगम संसाधनों और सामग्री का आवंटन करने के लिए कंप्यूटर का प्रयोग किया जाता है|
  • प्रगति अभिलेखों का रखरखाव प्रगति कारों के कुशलता एवं गोपनीयता से रखरखाव एवं संरक्षण करने के लिए कंप्यूटर का प्रयोग किया जाता है|
  • प्रत्यक्ष अंत क्रिया कंप्यूटर छात्रों और उसी की जाने वाली विषय वस्तु के बीच प्रत्येक अंत क्रिया प्रदान करते हैं|
  • ट्यूटोरियल और वार्तालाप कंप्यूटर द्वारा ट्यूटोरियल की भूमिका प्रभावशाली ढंग से निभाई जा सकती है इससे अध्यापक को छात्रों के ट्यूटोरियल वर्क में लगाए जाने में सहायता मिलती है अध्यापक और छात्रों के मध्य ट्यूटोरियल्स अंत क्रिया और वार्तालाप संभव हो जाता है|
  • समस्या समाधान एवं सृजनात्मकता कंप्यूटर का प्रयोग छात्रों के समस्या समाधान आत्मक योग्यता एवं सृजनात्मक विकसित करने के लिए किया जाता है|
  • प्रयोगशाला और प्रयोगात्मक कार्य कंप्यूटर का प्रयोग प्रयोगशाला और प्रयोगात्मक कार्यों के न्याय पूर्ति के लिए किया जाता है|
  • पुस्तकालय में कंप्यूटर का लाभ पुस्तक तो को सूची संबंधित सूचनाएं सूचनाएं को क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित करना पुस्तकों को के क्षेत्र शिक्षक विषय एवं पुस्तक के प्रकाशन आवंटन के अनुसार हजारों पुस्तकों के बीच सही क्रमबद्ध तरीके से रखना|
  • परीक्षाओं तथा प्रश्न बैंकों को सुरक्षित रखने में कंप्यूटर अपना अहम रोल निभाती है यह कंप्यूटर के अंदर एक प्रोग्रामिंग कर सेव कर दी जाती है जिससे गोपनीयता बनी हुई रहती है साथ ही इसमें पासवर्ड के जरिए इसे और ज्यादा सुरक्षित कर दिया जाता है|
  • परीक्षा मूल्यांकन में या काफी मददगार साबित होता है कम समय में परीक्षा मूल्यांकन मूल्यांकन किया जाता है कंप्यूटर के माध्यम से बड़ी-बड़ी से जटिल श्रृंखलाओं तथा डाटा को यह सुरक्षित रखता है|

इंटरनेट क्या है ? What is internet?

आज जहाँ इन्टरनेट व्यापार से लेकर बैंकिंग, एजुकेशन, कम्युनिकेशन, टेक्नोलॉजी और मनोरंजन का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है, वहीँ बिना इन्टरनेट के जीवन की कल्पना करना तो आज के युग में बहुत ही कठिन हो गया है. इन्टरनेट ने जहाँ आज हमारी बहुत सी समस्याओं का हल दिया है वहीँ हमारे लिए बहुत सी नयी समस्याओं को जन्म भी दिया है|

            इन्टरनेट एक दुसरे से जुड़े कई कंप्यूटरों का जाल है जो राउटर एवं सर्वर के माध्यम से दुनिया के किसी भी कंप्यूटर को आपस में जोड़ता है. दुसरे शब्दों में कहे तो सूचनाओ के आदान प्रदान करने के लिए TCP/IP Protocol के माध्यम से दो कंप्यूटरों के बीच स्थापित सम्बन्ध को internet कहते हैं. इन्टरनेट विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है|

हिंदी में इन्टरनेट : Internet Meaning In Hindi

Internet

इन्टरनेट एक इंग्लिश शब्द है जो इंग्लिश के ही एक और शब्द “Internetworked” से लिया गया है. Hindi में Internet का meaning होता है “अंतरजाल“|इन्टरनेट हजारों-लाखों कम्प्यूटरों का एक जाल है इसे हिंदी में अंतरजाल या फिर सामान्य भाषा में “महाजाल” भी कह सकते है|

इन्टरनेट का मालिक कौन है ? Owner of Internet

हार वस्तु का कोई न की मालिक तो होता ही है लेकिन अगर बात करे इन्टरनेट की, कि इन्टरनेट का मालिक कौन है या फिर इन्टरनेट पर किस का एकाधिकार है तो इस प्रश्न के दो उत्तर हो सकते है।

  1. कोई नहीं
  2. बहुत सारे लोग
  3. यहाँ कोई नहीं से तात्पर्य यह है कि इन्टरनेट का कोई भी एक मालिक नहीं है, और कोई भी देश या किसी भी देश की सरकार या कंपनी इन्टरनेट पर किसी भी प्रकार का एकाधिकार नहीं रखती है. कहने का तात्पर्य इन्टरनेट पर पूर्ण अधिकार किसी का भी नहीं है.
  4. दूसरे दृष्टिकोण से, हजारों लोग और संगठन इंटरनेट के मालिक हैं. इंटरनेट में कई अलग-अलग बिट्स और टुकड़े होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का एक मालिक होता है। इनमें से कुछ मालिक आपके पास इंटरनेट तक पहुंच की गुणवत्ता और स्तर को नियंत्रित कर सकते हैं। वे पूरे सिस्टम के मालिक नहीं हो सकते हैं, लेकिन वे आपके इंटरनेट के अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए “इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियां“|

History of Internet (इन्टरनेट का इतिहास)

कहते है आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है. यह बात इन्टरनेट की खोज पर बिलकुल सटीक बैठती है. इन्टरनेट का इतिहास बहुत ज्यादा पुराना नहीं है. सन 1960 में शीत युद्ध के दौरान गुप्त रूप से बहुत तेज गति से सूचनाओं के आदान प्रदान करने की आवश्यकता हुई|

इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर एक नेटवर्क की खोज हुई, जिसे आज हम इन्टरनेट के नाम से जानते है. अगर बात की जाये कि इन्टरनेट की खोज किसने की इसमें किसी एक व्यक्ति को पूरा श्रेय नहीं दिया जा सकता है. इन्टरनेट का आविष्कार करने में कई लोगों का योगदान था. आइये इन्टरनेट के इतिहास और खोजकर्ताओं पर संक्षेप में जानते है|

इन्टरनेट की खोज किसने की?

इंटरनेट की खोज के पीछे कई लोगो का हाथ था. शीत युद्ध के दौरान सबसे पहले लियोनार्ड क्लेरॉक (Leonard Kleinrock) ने अमेरिकी रक्षा विभाग को एक नयी तकनीक से लैस करने की योजना बनायीं. इस योजना के अनुसार कई कंप्यूटरों को आपस में जोड़ कर सूचनाओं का आदान प्रदान करना था, जिससे कि सेना को जरुरी जानकारी बहुत जल्दी मिल जाए|

इस नेटवर्क को बनाने में उनका साथ दिया एम.आई.टी. के वैज्ञानिक J.C.R. Licklider और रोबर्ट टेलर (Robert Taylor) ने. जिन्होंने ने सन 1962 में कंप्यूटर का एक “Galactic Network” बनाने का प्रताव रखा. जिस पर लगातार काम होता रहा|

और 1965 में, एक और एम.आई.टी. वैज्ञानिक ने एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक जानकारी भेजने का एक तरीका विकसित किया जिसे “Packet Switching” कहा गया। पैकेट स्विचिंग डाटा को ब्लाक या पैकेट में तोड़ कर डाटा ट्रान्सफर करता था|

इस तकनीक की शुरुआत सबसे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग की Advance Research Projects Agency (ARPA) द्वारा की गई थी। जिस वजह से इसे ARPANET का नाम दिया गया. ARPANET में एक computer से दूसरे computer से जोड़ने के लिए NCP यानि कि (Network Control Protocol) का इस्तेमाल किया गया था|

October 29, 1969 को ARPAnet के माध्यम से पहला सन्देश “LOGIN” लिख कर भेजा गया, जो कि आंशिक रूप से सफल हुआ और सन्देश के पहले दो अक्षर “LO” का ही डाटा ट्रान्सफर हुआ|

1969 के अंत तक, ARPAnet से सिर्फ चार कंप्यूटर जुड़े थे, लेकिन 1970 के दौरान यह नेटवर्क लगातार बढ़ता गया। 1971 में, इसने University of Hawaii के ALOHAnet को जोड़ा और दो साल बाद इसने लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज और नॉर्वे के रॉयल रडार प्रतिष्ठान में नेटवर्क को जोड़ा।

जैसे ही इस नेटवर्क से बहुत सारे कंप्यूटर जुड़ते गए जिससे इसे  वैश्विक स्तर पर एकीकृत करना कठिन होता चला गया. सन 1971 में सबसे पहला Email Ray Tomlinson ने भेजा था। जैसे जैसे इसके फायदे का पता चलता गया वैसे वैसे ही इसका इस्तेमाल बढता गया|

इन्टरनेट का जनक : Father of Internet in Hindi

Vint Cerf Father of Internet

1970 के दशक के अंत तक, विंटन सेर्फ नाम के एक कंप्यूटर वैज्ञानिक ने दुनिया के सभी मिनी-नेटवर्कों पर एक-दूसरे के साथ संवाद करने के लिए सभी कंप्यूटरों के लिए एक तरीका विकसित करके इस समस्या को हल करना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपने आविष्कार को “ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल” या TCP कहा।

बाद में, उन्होंने एक अतिरिक्त प्रोटोकॉल जोड़ा, जिसे “इंटरनेट प्रोटोकॉल” IP के रूप में जाना जाता है। आज हम जिस इन्टरनेट का प्रयोग करते है उसमे TCP/IP Protocol का ही इस्तेमाल किया जाता है|

सन 1974 में विंट सर्फ (Vint Cerf) और रोबर्ट ई. काहन (Robert E. Kahn) ने एक पेपर प्रकाशित किया जिसे “The Fathers Of The Internet” के नाम से जाना गया. इसी रिसर्च पेपर को प्रकाशित करने के कारण Vint Cerf को इन्टरनेट का जनक कहते है.

भारत में इन्टरनेट कब आया?

भारत में इन्टरनेट की शुरुआत 14 अगस्त 1995 को हो गयी थी लेकिन सार्वजानिक रूप से इसे 15 अगस्त 1995 को “विदेश संचार निगम लिमिटेड” यानि VSNL द्वारा चालू किया गया था। तब इन्टरनेट का इस्तेमाल महत्वपूर्ण सूचनाओं के आदान प्रदान करने के लिए किया गया था और इसकी स्पीड मात्र 8-10 kbps थी।

जब भारत में इन्टरनेट की शुरुआत हुई थी तब इससे मात्र 20-30 कंप्यूटर ही जुड़े थे और इन्टरनेट कनेक्शन का खर्च भी बहुत ज्यादा था, और 9-10 kbps स्पीड के इन्टरनेट का मासिक खर्चा 500-600 रूपये के आसपास था, जो कि उस समय के हिसाब से बहुत ही ज्यादा था|

जबकि आज के समय में इन्टरनेट प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में पहुँच चूका है और पढाई से लेकर व्यापार, चिकित्सा, तकनीक, सरकारी कार्यों इत्यादि तक में इन्टरनेट का प्रयोग होने लगा है|

इन्टरनेट की पहली वेबसाइट कौन थी? First website on Internet

tim Berners-Lee

इन्टरनेट पर पहला वेब पेज 6 अगस्त 1991 को लाइव हुआ था। यह वर्ल्ड वाइड वेब प्रोजेक्ट की जानकारी के लिए समर्पित था और इसे टिम बर्नर्स-ली (Berners-Lee) ने बनाया था। यह यूरोपीय संगठन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च में एक NeXT computer पर संचालित हुआ था|

इस पहले वेब पेज का एड्रेस http://info.cern.ch/hypertext/WWW/TheProject.html था.

इन्टरनेट कैसे काम करता है? How internet works

इन्टरनेट को सेटेलाईट के मध्यम से भी चलाया जाता है लेकिन हम जिस इन्टरनेट का उपयोग करते है वो सेटेलाइट के माध्यम से नहीं अपितु Opticle Fibres Cable द्वारा हम तक पहुँचता है. Opticle Fibres Cable को सबमरीन केबल भी कहते है|

हम जिस इन्टरनेट का उपयोग करते है वो तीन कम्पनियों के माध्यम से होते हुए हम तक पहुँचता है. हम इन तीनों कंपनियों को तीन भाग में विजभित कर लेते है. Tier 1, Tier 2, Tier 3

  • Tier 1 में वो कंपनी आती है जिन्होंने ऑप्टिकल फाइबर केबल का नेटवर्क समुद्र के अन्दर से पूरे विश्व भर में फैला रखा है. इन्ही केबल के माध्यम से दुनिया के सारे सर्वर एक दूसरे से कनेक्ट रहते है|
  • Tier 2 में टेलिकॉम कंपनियां जैसे आईडिया, वोडाफ़ोन, एयरटेल जैसी कंपनियां आती है जिनके माध्यम से इन्टरनेट हम तक पहुँचता है|
  • जबकि Tier 3 में लोकल एरिया की छोटी छोटी कंपनिया आती है जैसे तिकोना.

अब होता क्या है कि Tier 3 कि कम्पनियाँ Tier 2 से डाटा खरीदती है और Tier 2 कि कम्पनियाँ Tier 1 की कंपनी से प्रति GB के हिसाब से डाटा खरीदती है. हम लोग Tier 2 की कंपनियों से डाटा खरीदते है|

Tier 2 की कम्पनियाँ लैंडलाइन ओप्टिकल फाइबर केबल द्वारा अपने टावर को Tier 1 से कनेक्ट कर के रखते है. और वायरलेस नेटवर्क के माध्यम से इन्टरनेट कि सेवा हम तक पहुचाते है.

Types of internet  : इन्टरनेट के कितने प्रकार का होता है?

दोस्तों हम जिस इन्टरनेट का उपयोग करते है वह एक तरीके का सार्वजनिक नेटवर्क है जिसका प्रयोग कोई कोई भी कभी भी कर सकता है बस इसके लिए हमें नेटवर्क और डाटा कि आवश्यकता होती है|

इन्टरनेट के कई प्रकार होते है | Internet के बारे में लगभग सभी जानते है|  Intranet और Extranet ये भी एक प्रकार के इन्टरनेट ही है. हम में से बहुत से कम ही लोग ऐसे है जो Intranet और extranet के बारे में जानते होंगे.  इंट्रानेट और एक्सट्रानेट के बारे में संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है|

Intranet Kya hai?

Intranet भी इन्टरनेट की ही तरह कई कंप्यूटरों का नेटवर्क होता है. लेकिन यह इन्टरनेट से थोडा भिन्न है क्यूंकि हम जिस इन्टरनेट का उपयोग करते है वह एक सार्वजानिक network होता है|

जबकि Intranet प्राइवेट नेटवर्क होता है जो इंटरनेट की ही तरह TCP/IP  के माध्यम से डेटा और एप्लीकेशन को Internal रूप से साझा करता है|

इस तरह के नेटवर्क में लोकल एरिया (LAN) के कई नेटवर्क आपस में जुड़े हुए हो सकते है. और वाइड एरिया नेटवर्क में लीज्ड लाइन्स का भी इस्तेमाल हो सकता हैं|

Intranet भी इन्टरनेट की ही तरह आपस में जुड़े कई कंप्यूटरों का जाल होता है. लेकिन यह नेटवर्क प्राइवेट होता है और हर कोई सार्वजानिक रूप से इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता है|

इस तरह के नेटवर्क का उपयोग करके कंपनी अपने एक ऑफिस को दूसरे ऑफिस से कनेक्ट रखती है. और उसको एक्सेस करने के लिए यूजर, पासवर्ड का प्रयोग किया जाता है. बिना यूजर पासवर्ड के कोई भी इसको एक्सेस नहीं कर सकता है|

Extranet Kya Hai?

इन्टरनेट से इंट्रानेट में जाने की प्रक्रिया Extranet कहलाती है. यह एक “Private network” है. जो पब्लिक नेटवर्क की सहायता से डाटा प्रदान करता है. यह कंपनी और व्यापारिक साझेदारों के बीच एक माध्यम की तरह काम करता है. यह कंपनी की एक शाखा को दूर स्थित दूसरी शाखा को आपस में जोड़ कर डाटा शेयरिंग करने कि अनुमति देता है|

इसको access करने के लिए user और password कि आवश्यकता होती है. यह Intranet का ही एक हिस्सा है. इसका प्रबंधन एक से अधिक संस्थाओं द्वारा किया जाता है|

Internet, Intranet और Extranet में अंतर

Internet Intranet Extranet
1. यह एक पब्लिक नेटवर्क है. इसे दुनिया का कोई भी व्यक्ति चला कर सकता है. यह एक प्राइवेट नेटवर्क है. इसका उपयोग कंपनी या संस्थाएं अपनी निजी जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए करती है. यह भी प्राइवेट नेटवर्क है. यह पब्लिक नेटवर्क की सहायता से डाटा शेयर करने में माध्यम का काम करता है.
2. इन्टरनेट को चलाने के लिए किसी यूजर पासवर्ड कि आवश्यकता नहीं होती है. इंट्रानेट को चलाने के लिए यूजर पासवर्ड कि आवश्यकता होती है. इंट्रानेट कि ही तरह एक्सट्रानेट को भी चलाने के लिए यूजर पासवर्ड कि आवश्यकता होती है.
3. इसका उपयोग सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है. इसको केवल एक संस्थान द्वारा चलाया जाता है. इसका प्रयोग दो या दो से अधिक संस्थाओं के बीच डाटा शयेर करने के लिए होता है.
4. इसमें बहुत सारे computers का नेटवर्क होता है. इसमें केवल एक ही संस्थान के कंप्यूटरों का नेटवर्क होता है. इसमें दो या दो से अधिक संस्थानों के कंप्यूटर आपस में कनेक्ट होते है.
5. इसकी सिक्योरिटी यूजर द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली डिवाइस पर निर्भर करती है. इंट्रानेट कि सिक्योरिटी फायरवाल पर निर्भर करती है. इसकी सिक्योरिटी इन्टरनेट और इंट्रानेट के फायरवाल पर निर्भर करती है.

इन्टरनेट के फायदे और नुकसान :

इन्टरनेट आज जहाँ इंसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है वही इसके बहुत से नकारात्मक पहलु भी है.  Internet in Hindi के इस लेख में हम इन्टरनेट के लाभ और हानियों के बारे में जानेंगे|

इन्टरनेट के लाभ इन्टरनेट के नुकसान
1. इन्टरनेट कि सहायता से हम घर बैठे किसी भी जानकारी को प्राप्त कर सकते है. बहुत से लोग इन्टरनेट का दुरूपयोग भ्रामक और गलत जानकारियां फ़ैलाने के लिए भी करते है.
2. इन्टरनेट कि सहायता से हम घर बैठे व्यावसायिक कार्य भी कर सकते है. इन्टरनेट के माध्यम से लोगों कि जानकारी चुरा कर उनका गलत फायदा उठाया जा सकता है.
3. इन्टरनेट की मदद से हम hindi movie download करके ऑनलाइन फ्रेश एंटरटेनमेंट कर सकते है. बहुत से बच्चे गलत संगती में पड़ कर pornography जैसे अश्लील कंटेंट देखने लगते है. जिससे बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
4. इन्टरनेट कि मदद से youtube video Download भी कर सकते है. जरुरत से ज्यादा इन्टरनेट का इस्तेमाल करने से बहुमूल्य समय कि बर्बादी होती है.
5. इन्टरनेट कि सहायता से हम अपनी किसी भी इनफार्मेशन को ईमेल, facebook या whatsapp के माध्यम से तत्काल शेयर कर सकते है. आजकल बहुत से लोग ऑनलाइन फ्रॉड को अंजाम देते है जिसकी वजह से आपका आर्थिक नुकसान भी हो सकता है.
6. इन्टरनेट आज एजुकेशन के क्षेत्र में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है. एजुकेशन से सम्बंधित सभी प्रकार की जानकारियां इन्टरनेट पर सुगमता से उपलब्ध है. इन्टरनेट बहुत अधिक इस्तेमाल हमारे आँखों और शरीर के लिए बहुत ही नुकसानदायक है.
7. इन्टरनेट की सहायता से ticket booking, online banking जैसी सुविधाओं का लाभ घर बैठे ही उठा सकते है. बहुत सी एप और वेबसाइट ऐसी भी है जिनका प्रयोग करने पर हमारा पर्सनल डाटा चोरी हो सकता जो हमारा बहुत कुछ नुकसान कर सकता है.

इंटरनेट का उपयोग

आज इन्टरनेट के प्रयोग का दायरा बहुत ही ज्यादा असीमित हो चूका है. अपने प्रारंभिक दौर में इन्टरनेट का दायरा बहुत ही ज्यादा सीमित था और इसका प्रयोग वैज्ञानिक और रक्षा विभाग से सम्बंधित कार्यों कि सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए ही किया जाता था|

लेकिन जैसे जैसे इन्टरनेट की पहुच में आम आदमी आया इसके उपयोग का दायरा बढ़ता ही चला गया और आज असीमित क्षेत्रों में इसका उपयोग होने लगा और इन्टरनेट आज हमारे जीवन एक अभिन्न हिस्सा बन चूका है. आज इन्टरनेट का उपयोग कई चीजों में होगे लगा जैसे :

  • मनोरंजन के लिए
  • बैंकिंग के लिए
  • किसी भी डॉक्यूमेंट को मेल के माध्यम से ट्रान्सफर करने के लिए
  • आपस में बात चीत करने के लिए
  • नए दोस्त बना सकते है
  • online पढाई कर सकते है
  • घर बैठे शोपिंग कर कर सकते है
  • न्यूज़ पढ़ सकते है
  • मोबाइल, बिजली, phone का बिल जमा कर सकते है.
  • बिज़नस के प्रचार प्रसार के लिए.
  • विज्ञापन के लिए
  • किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इत्यादि

 ईमेल क्या हैं और ईमेल कैसे भेजते है ?

Table of Content

  1. ईमेल क्या होता है – What is Email?
  2. ईमेल बनाने के लिए क्या चाहिए?
  3. Email ID क्या होती है और कैसे बनाये – What is Email ID?
  4. ईमेल के फायदे – Benefits of Email?
  5. ईमेल के नुकसान – Limitations of Email
  6. ईमेल का इतिहास – History of Email
  7. आपने क्या सीखा?

Internet का उपयोग करने वाले लगभग सभी लोग ईमेल के बारे में बेसिक जानकारी रखते है. ये लोग जानते है कि ईमेल क्या है? Email Account कैसे बनाते है? Email Address का मतलब क्या होता है? Email ID बनाने का तरीका क्या है?

यदि आप भी Email Account बनाने का तरीका जानते है, तो आपको बधाई. और यदि आप ईमेल का मतलब नही जानते है, तो आपको चिंता करने की कोई जरूरत नही है. क्योंकि इस लेख में हम आपको Email के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं|

समझने में सुविधा के लिए इस लेख को निम्न भागों में बांट दिया है|

ईमेल क्या होता हैं – What is Email ?

Email इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों द्वारा किसी नेटवर्क (इंटरनेट) के जरिए संदेश भेजने-प्राप्त करने का एक साधन है. Email का मतलब Electronic Mail होता है. कार्यालयों, अदालतों, स्कूलों, कॉलेजों आदि जगहों पर Email को सूचना भेजने तथा प्राप्त करने का आधिकारीक तरीका बना लिया गया है|

यह कागज पर लिखी गई चिट्ठी के समान ही होता है. बस कागज के पत्र (Letter) और Email में इतना ही अंतर होता है कि एक कागज के पत्र को कागज पर लिखा जाता है, और Email को हमे Computer पर लिखना पडता है|

E-mail भी एक साधारण पत्र की तरह ही एक पत्र होता है. आप एक साधारण पत्र की कल्पना करीए और पता करिए हम उसे लिखते समय क्या-क्या काम करते है?

हम साधारण पत्र लिखते समय उसमें प्राप्त करने वाले का नाम (Receiver), पता (Address), संदेश (Message) और नीचे भेजने (Sender) वाले का नाम लिखते है. फिर उसे भेजने के लिए नदजीक के Post Office में जाकर उसे Post Box में डाल देते है. और पत्र प्राप्त करने वाले के पास कुछ दिनों में चला जाता है|

बिल्कुल इसी तरह ही Email में भी प्राप्त करने वाले का नाम (Receiver), पता (E-mail ID), और संदेश (Body) को लिखना पडता है. Email में भेजने वाले का नाम अलग से नही लिखना पडता है. इसमें भेजने वाले का नाम Automatic संदेश पाने वाले के पास चला जाता है|

और इसके बाद Send पर क्लिक करना पडता है. और Email कुछ ही सेकण्डों में भेजने वाले के पास पहुँच जाता है|

इसकी गती साधारण पत्र से Email को अलग बनाती है. इसके अलावा भी बहुत ऐसे कारण है, जो एक Email को एक साधारण पत्र से उपयोगी बनाती है|

आप इंटरनेट के द्वारा मिनटों में अपने संदेश को भेज तथा प्राप्त कर सकते है| यह सुविधा अधिकतर Email Service Providers द्वारा मुफ्त दी जाती है|

आपको सिर्फ इंटरनेट और एक इंटरनेट चलाने वाले Device, जैसे, Computer, Mobile Phone, Laptop आदि की आवश्यकत पडती है|

दुनियाभर में लोग एक-दूसरे को Mails Send तथा Receive करते है. आप अपने दोस्त, परिवारजन, सहकर्मी, बॉस आदि को Email Send कर सकते है|

इसके लिए बस आपको एक Email ID, Internet और एक Email Program की जरूरत होती है. जिस व्यक्ति के पास Email ID है, उसे कोई भी व्यक्ति जिसके पास भी Email ID है, Mails Send तथा Receive कर सकता है|

अब, आपके मन में भी यही प्रशन चल रहा होगा कि आखिर यह Email ID क्या है? Email ID कैसे बनाते है? ईमेल आई डी की जरूरत EMail भेजने और प्राप्त करने के लिए क्यों होती है?

आपको ज्यादा सोचने की जरूरत नही है. क्योंकि थोडी ही देर में आप Email ID से परिचित हो जाएंगे. और जान पाएंगे कि एक Email ID क्या होती है? Email ID की जरूरत क्यों पडती है?

खुद की ईमेल आइडी बनाने के लिए क्या चाहिए?

Email ID बनाने से पहले ये जान लेना जरूरी है कि इसे बनाने के लिए क्या-क्या चाहिए? हमें किन-किन चीजों की जरूरत पड़ने वाली है|

जैसा आपको ऊपर बताया कि ईमेल सर्विस मुफ्त है और ईमेल भेजने तथा प्राप्त करने के लिए एक भी रुपया खर्च नही करना पड़ता है. बस, हमें कुछ आवश्यक Email Tools की जानकारी होना चाहिए. जिनके नाम नीचे बताए गए है|

  • एक कम्प्यूटर या स्मार्टफोन
  • इंटरनेट कनेक्शन
  • ईमेल प्रोवाइडर
  • थोड़ासी डिजिटल साक्षरता

1 कम्प्यूटर या स्मार्टफोन

सबसे पहले आपको एक कम्प्यूटर चाहिए. अगर, आपके पास कम्प्यूटर की सुविधा नही है तो आप स्मार्टफोन से भी काम चला सकते है.

आप, गूगल करिए कि “मोबाइल फोन से ईमेल आइडी कैसे बनाते है” तो आपको जवाब मिल जाएगा|

2 इंटरनेट कनेक्शन

ईमेल एक ऑनलाइन सर्विस है. इसलिए, इसे इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट की जरूरत पड़ती है. आपका डिवाइस किसी ना किसी नेटवर्क से कनेक्ट होना चाहिए|

आपके स्मार्टफोन में जो इंटरनेट डेटा पैक है उसी से आप ईमेल आइडी बना लेंगे| आपको नया इंटरनेट कनेक्शन लेने की कोई जरूरत नहीं है|

3 ईमेल प्रोवाइडर

अब बारी आती है आप ईमेल अकाउंट बनाने के लिए किस कंपनी अथवा सर्विस प्रोवाइडर का इस्तेमाल करना पसंद करेंगे|

आपकी जानकारी के लिए बता दें. एक ईमेल सर्विस प्रोवाइडर डाकघर की भांती काम करता है|

आपको ईमेल आइडी देता है, भेजे गए ईमेल संभालता है, आए हुए ईमेल दिखाता है आदि|

आपकी सहायता के लिए हम यहां कुछ लोकप्रिय वेबमेल सर्विस प्रोवाइडर के नाम बता रहे है|

5 Best Webmail Providers

  • Gmail– दुनिया का एक लोकप्रिय फ्री ईमेल प्रोवाइडर है जीमेल. यह गूगल की सर्विस है. इसलिए, इसका उपयोग दुनियाभर में मौजूद इंटरनेट यूजर्स के अलावा बड़-बड़े बिजनेस ऑनर ईमेल आइडी बनाने के लिए करते है|
  • Yahoo! Mail– यह सर्विस आजकल भूल अवस्था में चल रही है. लेकिन, इसके फीचर और सर्विस आज की जरूरत के अनुसार ही काम कर रही है. इसलिए, याहू! मेल भी आपके लिए ईमेल आइडी बनाने के लिए बढ़िया टूल है|
  • Outlook– माइक्रोसॉफ्ट द्वारा निर्मित यह ईमेल सर्विस ज्यादातर पेशेवर तथा बिजनेस द्वारा ईमेल क्लाइंट के रूप में इस्तेमाल की जाती है. लेकिन, आउटलुक आपको पर्सनल ईमेल आइडी बनाने की मुफ्त सुविधा भी देता है|
  • Zoho Mail– जोहो मेल भी ईमेल आइडी बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है|
  • Rediffmail– यदि आप अपने दोस्तों से अलग दिखना चाहते है तो आप रेडिफमेल का इस्तेमाल कर सकते है. बाकि सेवाएं लगभग समान ही है बस पीछे का नाम बदल जाता है|

4 थोड़ी-सी डिजिटल साक्षरता

इन सभी टूल्स से सही तरह काम लेने के लिए आपको इनका उपयोग करना आना चाहिए. इसलिए, डिजिटल साक्षरता जरूरी है|

कम्प्यूटर की बेसिक जानकारीइंटरनेट पर काम करना तथा ईमेल टूल्स का इस्तेमाल करने का तरीका की बुनियादी नॉलेज जरूरी है|

लेकिन, आपको ज्यादा चिंता करने की जरूरत नही आप हमारे द्वारा बताए गए स्टेप्स को फॉलों करते जाएं. आप खुद की ईमेल आइडी बना लेंगे|

Email ID क्या होती है और कैसे बनाते हैं?

हम एक-दूसरे को भौतिक रूप से उसके नाम और उसके रहने का स्थान यानि पता से जानते है. हमे जब किसी व्यक्ति विशेष से कोई काम पडता है. तो हम उस व्यक्ति विशेष से उसके रहने के स्थान पर संपर्क करते है|

ठीक इसी तरह से Email भेजने तथा प्राप्त करने के लिए भी एक Address की जरूरत होती है. जिस पर Mails आएं और यहाँ से चले जाएं. इस Address को नेटलोक में Email ID कहते है. और एक Email ID बनाने के लिए एक E-mail A/c बनाना पडता है|

Email Accouont हम किसी Email Program के माध्यम से Free में बना सकते है. Gmail, Outlook, Yahoo Mail, Hotmail, Reddifmail आदि बेहतरीन Email Programs है. आप इनमें से किसी एक या अधिक के द्वारा अपने लिए Email A/c बना सकते है|

जब आपका Email A/c बन जाता है, तो Email Program आपको एक Email ID देते हैं. जैसे, knowledgecityonline@gmail.com एक Mail ID है. इस Email  ID को Google के Mail Program Gmail के द्वारा बनाया गया है|

यह एक ईमेल आईडी, जिसमें आप सभी भागों के बारे में जान सकते है|

एक Email ID में मुख्य रूप से दो भाग होते है. इनसे मिलकर एक Email ID बनती है. इन्हे आप ऊपर देख सकते है. पहला भाग Username होता है. और दूसरा भाग Domain Name कहलाता है. इनके बारे में अधिक जानकारी नीचे दी गई है-

1. Username

यूजरनेम, Email ID का @ से पहले वाला भाग होता है. इसका इस्तेमाल Email Account में Log in करने के लिए किया जाता है. तथा यह उस व्यक्ति की पहचान होती है. जिसे Email भेजते है और प्राप्त करते है. इसे हम अपनी सहुलियत के अनुसार चुनते है. हमारे उदाहरण में knowledgecityonline यूजरनेम है|

2. Domain Name

Email Address में @ के बाद वाला भाग Domain Name होता है. यह उस Server/Computer का नाम होता है, जहाँ से Internet के द्वारा हमारी सुचनाओं का आदान-प्रदान होता है|

ऊपर दिखाए गए Email Address में gmail.com एक Domain Name है. जिसमें एक Top Level Domain भी जुडा हुआ है. यहाँ .com एक Top Level Domain है|

हमारे बताए गए Email Address में gmail Service Provider है. और .com Service Provider के प्रकार को दर्शाता है. जैसे, यहाँ gmail एक Commercial सेवा प्रदाता है|

3. @ का चिन्ह

इसे AT बोला जाता है. इसे Email Address में Username और Domain Name को अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह Email ID का उपयोगी हिस्सा होता है|

ईमेल के फायदें – Benefits of Email

ईमेल का लाभ सभी प्रकार के लोगों को होता है. और आप इसका किस प्रकार इस्तेमाल करते है. यह बात आपके ऊपर निर्भर करती है. यहाँ हम कुछ सामान्य फायदों के बारे में बता रहे है|

1. संप्रेषण

ईमेल का सबसे पहला काम है संप्रेषण यानि कम्युनिकेशन. और इसे एक-दूसरे से संपर्क करने के लिए ही विकसित किया गया है|

तो पहला फायदा यही है हम इंटरनेट के द्वारा हमसे दूर रहने वाले लोगों से भी बातचीत कर सकते है. और उनका हाल-चाल पूछ सकते है. तथा अपना बता सकते है|

2. तुरंत जवाब

चिट्ठी भेजने और उसका जवाब मिलने तक महिनों लग जाते थे. जिसमें अब तो काफि सुधार हुआ है. मगर, ईमेल के द्वारा आप तुरंत अपना संदेश भेज सकते है और कुछ ही देर में जवाब भी प्राप्त कर सकते है|

अब, आपको पुनित से बात करने के लिए उसके पास जाने की कोई जरुरत नही हैं. आप ईमेल के द्वारा ही अपनी बात उसके पास पहुँचा सकते है. और उसके विचार ले सकते है|

3. लिखित दस्तावेज

ईमेल को आप कागज की तरह जला नही सकते है. और ना ही इसके खोने का डर होता हैं. आपके द्वारा भेजे गए प्रत्येक ईमेल की एक कॉपी Mail Server पर सुरक्षित रहती हैं|

इस ईमेल कॉपी को आप कभी भी जब चाहे तब देख सकते हैं. और ईमेल को कागज पर लिखि गई चिट्ठी के बराबर ही मान्यता प्राप्त है|

4. सस्ता

ईमेल का खर्चा ना के बराबर होता हैं. क्योंकि आपको लिखने के लिए कागज तथा पेन की जरूरत नहीं हैं. और ना ही आप डाकिया का खर्च देने वाले हैं|

ईमेल भेजने और प्राप्त करने के लिए आपके बस इंटरनेट डाटा पैक की जरूरत पडती हैं. अगर आपके डिवाईस (कम्प्युटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन इत्यादि) में एक्टिव डाटा पैक है. तब आप मुफ्त में ईमेल भेज एवं प्राप्त कर सकते है|

5. लिखने की आजादी

अब आपको कागज की चिंता नहीं करनी हैं. लिखिए, काटिए, लिखिए, काटिए, फिर लिखिए और फिर काटिए…

जब तक चाहे तब तक आप एक ईमेल को लिख व मिटा सकते हैं. और समय की भी कोई पाबंदी आपके ऊपर नही होती है|

इसलिए इतमीनान से अपना संदेश लिख सकते है. और एक-एक शब्द का चुनाव अपनी पसंद से कर सकते है|

6. मल्टीमिडिया भी भेज सकते है

आप ईमेल के द्वारा केवल शब्दों में ही अपनी बात कहने के लिए सीमित नहीं है. अपनी फोटों, साथ बिताएं पलों की स्मृतियाँ, विडियों, या फिर अपके द्वारा गाया हुआ गाना भी ईमेल के साथ भेज सकते है|

7. कई तरह की फाइल साझा कर सकते है

ईमेल के द्वारा आप विभिन्न प्रकार के दस्तावेजों को Email Attachments के रूप में भेज सकते है. और अपनी जरूरत के अनुसार मंगा भी सकते है|

8. सुरक्षित और भरोसेमंद

ईमेल एक सुरक्षित और विश्वसनीय साधन हैं. यह आपके संदेश को हर हालात में पहुँचाने की कोशिश करता हैं और आप 99.99% तक भरोसा रख सकते है|

आपकी ईमेल चिट्ठी रास्ते में गायब नही होगी और ना ही कबुतर को पकडने का डर हैं. साथ ही कोई तीसरा व्यक्ति भी आपके ईमेल को पढ नही सकता है|

ईमेल के कुछ नुकसान ‌‌‌- Limitations of Email ?

ईमेल के लिए हमें कई प्रकार के साधनों की जरूरत पडती हैं. और यह चिट्ठी के जितना आसान नही है. इसलिए हर कोई ईमेल का उपयोग नही कर सकता है. नीचे ईमेल की कुछ सीमाओं के बारे में बताया जा रहा है|

1. तकनीक का जानकार होना चाहिए

यदि आप ईमेल का उपयोग करना चाहते है तो आपको पहले इसके बारे में सीखना पडता हैं. तभी आप ईमेल भेज तथा प्राप्त कर सकते हैं|

इसलिए, ईमेल भेजने के लिए आपके पास बेसिक कम्प्युटर, इंटरनेट तथा ईमेल प्रदाता आदि के बारे में शुरुआती जानकारी होना जरूरी है|

2. इंटरनेट पर निर्भरता

ईमेल भेजने तथा प्राप्त करने के लिए आपके पास इंटरनेट कनेक्शन या फिर मोबाइल फोन में डाटा पैक होना चाहिए. तभी आप ईमेल का उपयोग कर सकते है|

3. फाईल आकार की बाध्यता

आप ईमेल के द्वारा फाइल तो शेयर कर सकते है. मगर आप एक निश्चित आकार की फाइल ही मेल के द्वारा भेज सकते है. यदि आपके पास उपलब्ध डाटा तय सीमा से ज्यादा बडा है तब ईमेल आपके कोई काम का नही है. इसके लिए आपको दूसरा साधन ढूँढना ही पडेगा|

3.   अनजान तथा अनचाहे ईमेल आना

        ईमेल का सबसे बडा नुकसान इसे ही समझा जाता हैं. एक बार आपकी Email ID लोगों को पता चलने के बाद नए-नए लोगों से ईमेल आने लगते हैं. और सोचने वाली बात यह है कि आप इन्हे जानते भी नही है. इन अनजाने और अनचाहे ईमेलों को तकनीक की भाषा में SPAM कहा जाता हैं|

ईमेल का इतिहास – History of Email

ईमेल को बनाने का कार्य 1960 के आसपास ही शुरु हो गया था. लेकिन, अभी तक कोई ठोस आधार नहीं नही बन सका था|

ईमेल ने अगले 10 सालों में बहुत विकास किया. और अपना वजूद बना लिया. सन 1971 में ARPANET के एक प्रोग्रामर श्रीमान Ray Tomlinson ने आधुनिक ईमेल बना लिया.

इनके द्वारा विकसित किया गया Email इस्तेमाल करने में आसान और बहमशीनिय था. मतलब, आप एक कम्प्युटर से कई अन्य कम्प्युटरों पर ईमेल भेज सकते थे. जो आज सामान्य बात है. मगर 1970 से पहले ये संभव नहीं था|