झारखण्ड में खनिज संसाधन

खनिज संसाधन की दृष्टि से झारखण्ड भारत का एक समृद्धशाली राज्य है।

यहाँ भारत में उत्पादित कुल खनिजों का लगभग 40% उत्पादन होता है। यहाँ पाये जाने वाले खनिजों की संख्या 30 से भी अधिक है। इनमें से लगभग 16 प्रकार के खनिजों का उत्पादन भी हो रहा है। यहाँ के अर्थव्यवस्था का मूल आधार खनिज पदार्थ एवं उन पर निर्भर उद्योग-धंधे हैं। देश के कुल खनिज – सम्पदा का एक चौथाई से ज्यादा भाग इस राज्य के गर्भ में समाहित है। खनिज संसाधनों की प्रचुरता के कारण झारखण्ड राज्य की भूमि को ‘रत्नगर्भा कहा जाता है। झारखण्ड का छोटानागपुर का पठार भारत का सर्वाधिक खनिज सम्पदा सम्पन्न क्षेत्र है। खनिजों से समृद्ध होने के कारण ही इस क्षेत्र को भारत का रूर क्षेत्र कहा जाता है। नए-नए खनिजों के सर्वेक्षण हेतु आधारभूत संरचना का विकास किया जा रहा है।

झारखण्ड के खनिजों को 3 वर्गों में बांटा जाता है—धात्विक खनिज, अधात्विक खनिज एवं ऊर्जा खनिज।

धात्विक खनिज को दो उपवर्गों में बाँटा जाता है—लौह धात्विक खनिज एवं अलौह धात्विक खनिज।

  1. लौह धात्विक खनिज लौह धात्विक खनिज का विवरण इस प्रकार है

(i) लौह अयस्क (Iron Ore) :  अनुमानतः सम्पूर्ण भारत के लौह अयस्क का 30% भंडार  झारखण्ड में है। लौह अयस्क की प्राप्ति का क्षेत्र सिंहभूम जिला का दक्षिणी भाग है। सिंहभूम के दक्षिणी भाग में लौह अयस्क की पेटी है, जो 48 किमी. लंबी पट्टी के रूप में उड़ीसा के मयूरभंज एवं क्योंझर तक विस्तृत है। यह पट्टी विश्व के सबसे बड़े लौह भण्डार के रूप में मानी जाती है। सिंहभूम के दक्षिणी भाग में स्थित नोवामुण्डी, गुआ, पनसीराबुरू, बादाम पहाड़ जामदा, गुरुमहिसानी, किरीबुरू आदि लोहे के प्रमुख खान हैं। पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित नोवामुण्डी की खान एशिया की सबसे बड़ी लोहे की खान है। इन खानों से उच्च कोटि का हेमेटाइट वर्ग का लौह अयस्क उत्पादित किया जाता है। हेमेटाइट वर्ग के लौह अयस्क में लोहे का अंश 60% से 68% तक होता है। झारखण्ड में उपलब्ध लौह अयस्कों में 99% भाग हेमेटाइट वर्ग के लौह अयस्कों का है।

(ii) मैंगनीज (Mangnese) : यह  एक धातुपूरक खनिज है, जिसका उपयोग प्रधानतः इस्पात बनाने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका उपयोग सूखी बैट्री, रसायन उद्योग आदि में भी किया जाता है। मैंगनीज का उत्पादन भी यहाँ के लौह-अयस्क के उत्पादन के साथ-साथ शुरू हुआ, क्योंकि इस्पात कारखानों में यह आवश्यक कच्चा माल है। अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह मध्य प्रदेश से मैंगनीज का आयात करता है। झारखण्ड में मैंगनीज का निक्षेपण आर्कियन युग की चट्टानों में पाया जाता है। यहाँ मैंगनीज के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं—गुवा से लिमटू, चाईबासा से बरजामुण्डा एवं बड़ा जाम्दा से नोवामुण्डी। कालेन्दा, बन्साडेरा, पन्सारीबुरू एवं पहाड़पुर आदि मैंगनीज की प्रमुख खान हैं। एक अन्य क्षेत्र, जो सिंहभूम के पूर्वी भाग में घाटशिला के उत्तर में है, वहाँ मैंगनीज का सीमित निक्षेप पाया जाता है। कालेन्दा, बंसाडेरा, पनसीराबुरु और पहाड़पुर इसके उल्लेखनीय उत्खनन क्षेत्र हैं, जहाँ से झारखण्ड का अधिकांश मैंगनीज निकाला जाता है। इनके अतिरिक्त धनबाद, गिरिडीह और हजारीबाग क्षेत्रों में भी मैंगनीज के जमाव पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों को मैंगनीज के औसत कोटि का क्षेत्र कहा जाता है।

(iii) क्रोमाइट (Chromite) : क्रोमाइट भी धातुपूरक खनिज है, जिसका उपयोग इस्पात बनाने में किया जाता है। यह खनिज आर्कियन युग की आग्नेय चट्टानों की नसों में निक्षेपित हुआ है। धातु उद्योग के अतिरिक्त इसका उपयोग रासायनिक एवं रिफ्रेक्टरी उद्योगों में भी किया जाता है। झारखण्ड में सिंहभूम क्षेत्र में क्रोमाइट के सर्वाधिक रक्षित भण्डार पाए जाते हैं। झारखण्ड में क्रोमाइट का मुख्य जमाव सिंहभूम के जोजोहातू और सरायकेला क्षेत्रों में है। इसके अतिरिक्त गुड़गाँव, कुसमिता, जनोआ-रेज, कोचा और टोण्टो में भी क्रोमाइट का जमाव देखने को मिलता है। धनबाद और हजारीबाग क्षेत्रों में भी क्रोमाइट के निक्षेप मिलते हैं, जिन्हें आंका जा रहा है। यहाँ पाए जाने वाले क्रोमाइट में धातु की मात्रा 53% से अधिक है, जिसके कारण इसकी माँग अधिक है। यहाँ देश के कुल क्रोमाइट भण्डार का लगभग 5.3% भाग पाया जाता है।

(iv) जस्ता (Zinc) : यह संथाल परगना, हजारीबाग, पलामू, राँची व सिंहभूम जिले में पाया जाता है।

(v) टिन (Tin) : यह हजारीबाग एवं राँची में पाया जाता है।

2. अलौह धात्विक खनिज अलौह धात्विक खनिजों का विवरण इस प्रकार है

(i) ताँबा (Copper) : यह एक बहुत उपयोगी धातु है। इसका उपयोग बिजली उपकरण, घरेलू बर्तन, धातु मिश्रण आदि कई कार्यों में किया जाता है। झारखण्ड ताँबा उत्पादन में भारत का अग्रणी राज्य है, जहाँ देश का 33% ताँबा उत्पादित किया जाता है। झारखण्ड में ताँबे का भण्डार सिंहभूम की ताँबा पेटी में दुआरपुरम में तथा बहरागोड़ा के मध्य 130 किमी की लम्बाई में फैला हुआ है। इस ताँबा पेटी में मुसाबनी, धोबनी, सुरादा, केन्दाडीह, पथरगोड्डा, घाटशिला एवं राखा मुख्य खाने है, जो क्षेत्र का अधिकांश ताँबा उत्पादन करती हैं। जाराडीह, बारागण्डा, पारसनाथ, हजादू और सरविल एवं बिवाखी (सन्थाल परगना) अन्य मुख्य ताँबा क्षेत्र हैं। हजारीबाग एवं संथाल परगना के कुछ हिस्सों में भी ताँबा मिलता है। यहाँ ताँबा गलाने और शोधन करने के लिए घाटशिला, राखा और मऊ भण्डार में कारखाने स्थापित किए गए हैं।

(ii) बॉक्साइट (Bauxite) : बॉक्साइट से एल्यूमीनियम निकाला जाता है। एल्युमीनियम का उपयोग आज विविध रूपों में घर से लेकर, कारखानों, परिवहन, बिजली के सामान तक में किया जाता है, क्योंकि हल्का होने के साथ-साथ यह मजबूत भी होता है। राज्य में बॉक्साइट की प्राप्ति मध्ययुगीन चट्टानों से की जाती है। बॉक्साइट के सुरक्षित भण्डार और उत्पादन के दृष्टिकोण से झारखण्ड एक अग्रणी राज्य है, जो अकेले भारत का लगभग 32% बॉक्साइट उत्पादन कर प्रथम स्थान पर है। यहाँ उच्च कोटि का बॉक्साइट पाया जाता है, जिसमें 52% से 55% तक एल्यूमीनियम होता है। बॉक्साइट को गलाकर धातु के अंश को निकाला जाता है तथा इसको गलाने का संयन्त्र मुरी में स्थित है। झारखण्ड में बॉक्साइट का उत्पादन लगातार बढ़ता जा रहा है। यह बढ़ोतरी देश में एल्युमीनियम की बढ़ती माँग के कारण है। अब तक प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में इसके जमाव का पता लगा है। झारखण्ड में पाट प्रदेश तथा राँची, हजारीबाग, राजमहल के पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च कोटि के बॉक्साइट का निक्षेप है, जिसमें 51% से 55% तक एल्युमीनियम है। वर्तमान में इसका सबसे अधिक उत्खनन लोहरदगा, राँची पठार और पलामू क्षेत्र के पाट क्षेत्र म किया जा रहा है। यहाँ की मुख्य खाने सरेंगदाग, बगड़, दुदहा, कच्चा, खमार, बंजारी आदि हैं। इसके अतिरिक्त पाखर छपदुअरिया, पकरी, औरंगा, बन्दा तथा वार में भी उत्खनन कार्य हो रहा है। राजमहल की पहाड़ियों में भी बॉक्साइट के भण्डार मिले हैं। 

(iii) टंगस्टन (Tungsten) : इसका उपयोग बिजली उद्योग आदि में किया जाता है। यह हजारीबाग में पाया जाता है।

(iv) सोना (Gold) : स्वर्णरेखा नदी की बालू को छानकर सोने के कण प्राप्त किये जाते थे, इसीलिए नदी का नाम स्वर्ण रेखा (सुवर्णरेखा) पड़ा। ये सोने के कण छोटानागपुर के पठारों के अपक्षयण से आते थे, जिसमें कोयले के प्राचीनतम भण्डार हैं। इसके क्षेत्र सिंहभूम की स्वर्णरेखा नदी की घाटी, पलामू की सोन नदी की घाटी, हजारीबाग की दामोदर नदी की घाटी में थे। अब यह सोना उपलब्ध नहीं होता, लेकिन उपलब्धि के प्रमाण मिलते हैं। वर्तमान में करीब 350 किग्रा. सोना का औसत उत्पादन हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) के मऊ कॉपर प्लाँट (घाटशिला) में प्रति वर्ष होता है, जो ताँबा अयस्क से उपउत्पाद (Biproduct) के रूप में निकाला जाता है।

(v) चाँदी (Silver) : चाँदी अल्प मात्रा में हजारीबाग, पलामू, राँची, सिंहभूम आदि जिलों में मिलती है, लेकिन कच्चे रूप में।

(vi) वैनेडियम (Vanadium) : यह सिंहभूम के दुलपारा एवं दुबलावेटन में पाया जाता है।

अधात्विक खनिज अधात्विक खनिजों का विवरण इस प्रकार है

(i) अभ्रक (Mica) : इसका उपयोग बिजली के सामान, औषधि, शीशा, सजावटी सामान, अग्निरोधक सामग्री, संचार संयंत्र आदि में किया जाता है। कोडरमा जिले में स्थित कोडरमा एवं झुमरी तिलैया अभ्रक के प्रमुख क्षेत्र हैं। कोडरमा को ‘भारत की अभ्रक राजधानी’ (Mica Capital of India) के नाम से भी जाना जाता है। झारखण्ड में उच्च कोटि का सफेद अभ्रक (Muscovite) मिलता है, जिसे रूबी अभ्रक (Ruby Mica) कहा जाता है। इसकी गुणवत्ता के कारण विश्व बाजार में इसकी अधिक माँग है। यही कारण है कि झारखण्ड के कुल अभ्रक उत्पादन का 90% भाग निर्यात किया जाता है।

(ii) चूना पत्थर (Lime Stone) : इससे सीमेंट बनता है, जिसका उपयोग इमारत बनाने में किया जाता है। इस्पात भट्टी में यह कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होता है। हजारीबाग, राँची, सिंहभूम एवं पलामू इसके प्रमुख क्षेत्र हैं।

(iii) कायनाइट (Kyanite) : अनुमानतः सम्पूर्ण भारत के  कायनाइट का 95% भंडार  झारखण्ड में है।यह ताप सहन करने वाला खनिज है इसलिए इसका उपयोग तापसह्य सामग्री के निर्माण में किया जाता है। लोहा गलाने की भट्टियों में इसका स्तर दिया जाता है। कायनाइट का सबसे बड़ा भण्डार सिंहभूम क्षेत्र के लिप्साबुरू क्षेत्र में है। सिंहभूम के राजखरसावां के निकट इसका उत्पादन  भारतीय ताँबा निगम द्वारा किया जाता है।

(iv) डोलोमाइट (Dolomite) : इसका उपयोग कागज, सीसा, लौह-इस्पात, सीमेंट एवं गृह सामग्री के उद्योगों में होता है। पलामू जिला का डाल्टेनगंज क्षेत्र इसका प्रमुख क्षेत्र है।

(v) ग्रेफाइट (Graphite) : यह कार्बन का एक रूप है, जिसे काला सीसा (black lead) भी कहा जाता है। इसका उपयोग उच्चतापसह्य उद्योग (Refractory Industry) में उच्चतापसह्य सामिग्रियों के निर्माण में किया जाता है। यह पलामू के बारेसनट, नारोमार, कोजरूम एवं लाट क्षेत्र में मिलता है।

(vi) एस्बेस्टस (Asbestos) : इसका उपयोग छत बनाने में एवं रासायनिक उद्योगों में होता है। यह राँची एवं सिंहभूम जिले में प्राप्त होता है।

(vii) अग्निमृत्तिका/अग्निसह्य मिट्टी (Fire Clay) : यह ताप की कुचालक होती है, इसलिए इस मिट्टी से बनी ईंटों का उपयोग ताप भट्टियों के निर्माण में किया जाता है। यह दामोदर घाटी, पलामू, राँची आदि स्थानों पर मिलती है।

(viii) चीनी मिट्टी (China Clay or Kaolin) : यह मिट्टी फेल्सपार नामक खनिज के अपरदन के फलस्वरूप बनाती है। चीनी मिट्टी से बिजली के उपकरण, घरेलू बरतन आदि बनाये जाते हैं। यह सिंहभूम, राँची, धनबाद, हजारीबाग, संथाल परगना आदि क्षेत्रों में मिलती है।

(ix) सोप स्टोन (Soap Stone) : इसका उपयोग पेंसिल, वार्निस एवं पाउडर बनाने में होता है। यह सिंहभूम एवं हजारीबाग में पाया जाता है।

ऊर्जा खनिज ऊर्जा खनिजों का विवरण इस प्रकार है

(i) कोयला (Coal) : कोयला के मामले में झारखण्ड देश का अग्रणी राज्य है। पूरे देश के उत्पादन का एक-तिहाई उत्पादन यहाँ होता है। झारखण्ड में कोयला उत्पादन के पाँच प्रमुख क्षेत्र हैं|

झारखण्ड में कोयला उत्पादन के पाँच प्रमुख क्षेत्र
क्षेत्र का नाम प्रमुख उत्पादक केन्द्र
दामोदर घाटी कोयला क्षेत्र झरिया, चन्द्रपुरा, रामगढ़, बोकारो, कर्णपुरा आदि
बराकर बेसिन क्षेत्र हजारीबाग का इटखोरी, कुजू व चोप, गिरिडीह आदि
अजय बेसिन क्षेत्र  हजारीबाग जिला का जयंती, सहगोरी, कुंडित, करैया आदि
राजमहल पहाड़ी क्षेत्र ब्राह्मणी, पंचवारा, छप्परविट्टा, गिलवाड़ी, हैना आदि
उत्तरी कोयल बेसिन क्षेत्र डाल्टेनगंज, हुटार, औरंगा नदी एवं अमानत नदी क्षेत्र आदि।

झारखण्ड में उच्च कोटि का कोयला पाया जाता है। यहाँ बिटुमिनस एवं एन्थ्रासाइट दोनों ही उपयोगी प्रकार के कोयले उपलब्ध हैं। बिटुमिनस कोयले में 78% से 86% तक कार्बन का अंश होता है तथा इसका उपयोग घरेलू कार्यों में होता है। एन्थ्रासाइट कोयले में 94% से 98% तक कार्बन का अंश होता है। यह राज्य के आय का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है। झारखण्ड को खनिजों से होने वाली कुल आय का 75% कोयले से प्राप्त होता है।

झारखण्ड में उपलब्ध कोयले के तीन प्रकार हैं—कोकिंग, अर्द्ध कोकिंग एवं गैर-कोकिंग। कोकिंग (Coking) व अर्द्ध कोकिंग (Semi Coking)अनुमानतः सम्पूर्ण भारत के कोयले का 80% और कोकिंग कोयले का 100% भंडार झारखण्ड में है।

कोयले का उपयोग भारी उद्योगों में विशेषकर धात्विक उद्योगों में धौंक भट्टी (Blast Furnace) में होता है। गैर कोकिंग (Non Coking) कोयले का उपयोग स्पॅन्ज लोहा, ताप शक्ति, रेलवे, सीमेंट, खाद, ईंट भट्टी, घरेलू ईंधन आदि में होता है। कम लागत में अधिक उत्पादन के उद्देश्य से झारखण्ड के कोयला क्षेत्रों में परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। सोवियत रूस की सहायता से चलने वाली दो परियोजनाएँ हैं झरिया क्षेत्र से कुमारी ओ.सी.पी. कोयला क्षेत्र का विकास तथा झरिया क्षेत्र के सीतानाला का विकास। वर्ल्ड बैंक की सहायता से चलने वाली पाँच परियोजनाएं हैं—झरिया कोकिंग कोयला परियोजना, रजरप्पा परियोजना, राजमहल परियोजना, दामोदर परियोजना तथा कतरास परियोजना।

(ii) यूरेनियम (Uranium) : इसका मुख्य खनिज पिचब्लैण्ड है। यूरेनियम आण्विक खनिजों में सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो मुख्यत: धारवाड़ और आर्कियन युग की चट्टानों में अन्य खनिजों के साथ पाया जाता है। झारखण्ड में यह दो स्वरूपों में पाया जाता है-पिचब्लैण्ड पेग्मेटाइट और यूरेनियम कम्पाउण्ड। उत्पादन की दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादन क्षेत्र जादूगोड़ा क्षेत्र है। यहाँ एक यूरेनियम शोध कारखाना स्थापित किया गया है। एक टन यूरेनियम अयस्क के शोधन के बाद एक किलोग्राम यूरेनियम प्राप्त होता है।

(iii) थोरियम (Thorium) : यह एक आण्विक खनिज है। इसका विस्तार राँची पठार और धनबाद में है।

(iv) इल्मेनाइट (Illmenite) : यह एक आण्विक खनिज है। इसका उपयोग अंतरिक्ष यान एवं अणुशक्ति वाले अन्तः यान में काम आने वाले धातु टाइटेनियम बनाने में होता है। यह राँची जिला क्षेत्र में मिलता है।

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